1 लाख से अधिक निवेशक प्रभावित; सीधे फंड ट्रेल के अभाव में कोर्ट से जमानत, टेक इंफ्रास्ट्रक्चर की भूमिका पर जांच तेज

“₹17,000 करोड़ का क्रिप्टो घोटाला: फोर्ब्स लिस्टेड टेक एक्सपर्ट गिरफ्तार, 80,000 BTC की गूंज”

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By Roopa
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नई दिल्ली/मुंबई। देश के सबसे बड़े क्रिप्टोकरेंसी घोटालों में शुमार गेनबिटकॉइन मामले में जांच एजेंसियों ने बड़ी कार्रवाई करते हुए फोर्ब्स 30 अंडर 30 एशिया 2018 सूची में शामिल रहे टेक विशेषज्ञ आयुष वर्षनेय को गिरफ्तार किया है। उन्हें मुंबई एयरपोर्ट से उस समय हिरासत में लिया गया, जब वह कथित तौर पर देश छोड़ने की कोशिश कर रहे थे। करीब ₹17,000 करोड़ (लगभग $2.1 बिलियन) के इस बहुचर्चित घोटाले में यह गिरफ्तारी जांच के लिए एक अहम मोड़ मानी जा रही है।

गेनबिटकॉइन स्कीम की शुरुआत वर्ष 2015 में अमित भारद्वाज और अजय भारद्वाज ने की थी। यह योजना क्लाउड माइनिंग के नाम पर चलाई जा रही थी, जिसमें निवेशकों को 18 महीनों तक हर महीने करीब 10 प्रतिशत तक रिटर्न देने का वादा किया गया था। इतनी ऊंची और स्थिर आय का लालच देकर बड़ी संख्या में लोगों को इसमें निवेश के लिए आकर्षित किया गया। 2016 की नोटबंदी के बाद जब देश में डिजिटल करेंसी को लेकर जागरूकता और उत्साह बढ़ा, तब इस स्कीम ने तेजी से विस्तार किया।

जांच में खुलासा हुआ है कि इस योजना के जरिए करीब 80,000 बिटकॉइन जुटाए गए, जो इसे देश के सबसे बड़े क्रिप्टो फ्रॉड मामलों में शामिल करता है। इस स्कीम में रेफरल मॉडल भी जोड़ा गया था, जिसमें नए निवेशक जोड़ने पर 12 प्रतिशत तक कमीशन दिया जाता था। इससे यह एक पोंजी या पिरामिड स्कीम की तरह काम करने लगा, जहां नए निवेशकों के पैसे से पुराने निवेशकों को भुगतान किया जाता था।

जांच एजेंसियों के अनुसार, आयुष वर्षनेय ने इस पूरे नेटवर्क के तकनीकी ढांचे को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी कंपनी डार्विन लैब्स पर आरोप है कि उसने यूजर इंटरफेस, माइनिंग प्लेटफॉर्म और एमकैप टोकन जैसी डिजिटल संरचनाएं तैयार कीं, जिनके माध्यम से निवेशकों को जोड़ा गया और फंड का प्रबंधन किया गया।

हालांकि, बचाव पक्ष का कहना है कि वर्षनेय केवल तकनीकी डेवलपर थे और उनका इस स्कीम के वित्तीय संचालन या निवेशकों से सीधे धन लेने-देने से कोई संबंध नहीं था। उनका दावा है कि इस पूरे नेटवर्क का संचालन मुख्य रूप से अमित भारद्वाज और उनके सहयोगियों द्वारा किया जा रहा था। गौरतलब है कि इस मामले के प्रमुख आरोपी अमित भारद्वाज का पहले ही निधन हो चुका है।

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वहीं, जांच एजेंसी ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा है कि पूछताछ के दौरान आरोपी ने सहयोग नहीं किया और सह-आरोपियों तथा कथित रूप से ठिकाने लगाए गए क्रिप्टो एसेट्स के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई। अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में डिजिटल ट्रांजेक्शन की कड़ियों को जोड़ना बेहद जटिल है, लेकिन यही जांच की सबसे अहम कड़ी भी है।

इस घोटाले की जांच को दिसंबर 2023 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद और गति मिली, जब देशभर में 60 से अधिक ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की गई। इन कार्रवाइयों के दौरान करीब $2.59 मिलियन मूल्य की क्रिप्टोकरेंसी के साथ-साथ बड़ी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य बरामद किए गए, जिनमें सर्वर, डिजिटल वॉलेट और ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड शामिल हैं।

गंभीर आरोपों के बावजूद, 7 अप्रैल को दिल्ली की एक अदालत ने आयुष वर्षनेय को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने सीधे तौर पर निवेशकों के धन को प्राप्त या नियंत्रित किया।

यह मामला एक बार फिर क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े अनियमित और अनियंत्रित निवेश मॉडलों के जोखिम को उजागर करता है। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि अत्यधिक रिटर्न का वादा करने वाली योजनाएं अक्सर पोंजी स्कीम साबित होती हैं।

फिलहाल, जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क के विस्तार, अन्य आरोपियों की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फंड के प्रवाह का पता लगाने में जुटी हैं। हजारों निवेशकों की नजर अब इस जांच पर टिकी है, क्योंकि आने वाले दिनों में इस घोटाले से जुड़े और भी बड़े खुलासे सामने आने की संभावना है।

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