लखनऊ। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में तैनात एक महिला पीसीएस अधिकारी और तहसीलदार ने जिला प्रशासन में तैनात वरिष्ठ अधिकारियों और कुछ क्लर्कों पर गंभीर उत्पीड़न और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। मामले ने तूल तब पकड़ लिया जब तहसीलदार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को वीडियो संदेश भेजकर न्याय की मांग की और सीधे तौर पर जिला मजिस्ट्रेट (DM) पर उत्पीड़न का आरोप लगाया।
तहसीलदार राकी शर्मा ने आरोप लगाया कि उन्हें लगातार मानसिक दबाव में रखा गया, उनके कार्यस्थल पर घंटों बैठाए रखा गया और कई बार अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि यह पूरा मामला लगभग नौ महीने से चल रहा है।
शर्मा के अनुसार, उनके वेतन को आठ महीनों तक रोका गया और केवल तब जारी किया गया जब उन्होंने न्याय के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा थी।
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तहसीलदार ने आरोप लगाया कि जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में तैनात कुछ क्लर्क—जिनमें एक ओएसडी, पेशकार और सीआरए शामिल हैं—एक समूह के रूप में काम करते हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। उन्होंने कहा कि इन्हीं लोगों की शिकायत उन्होंने पहले भी DM से की थी, जिसके बाद उल्टा उनके खिलाफ ही कार्रवाई शुरू कर दी गई।
शर्मा ने यह भी आरोप लगाया कि उनसे महंगे उपहारों की मांग की गई, जिनमें लगभग ₹1.75 लाख मूल्य का iPhone और Apple Watch शामिल था। उन्होंने दावा किया कि इन वस्तुओं की व्यवस्था क्लर्कों के माध्यम से कराई गई। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित iPhone अभी भी DM के उपयोग में है और उनके पास इसके बिल और दस्तावेज मौजूद हैं।
तहसीलदार के अनुसार, जब उन्होंने कथित भ्रष्टाचार की शिकायत की, तो पहले DM ने कार्रवाई का आश्वासन दिया, लेकिन बाद में वही लोग उनके खिलाफ हो गए और उन्हें निशाना बनाया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ मनगढ़ंत जांच बैठाई गई और सेवा रिकॉर्ड में प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज की गई, जिससे उनका करियर प्रभावित हुआ।
शर्मा ने बताया कि उन्होंने 26 फरवरी 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उनके अनुसार, 27 फरवरी को जैसे ही प्रशासन को इस याचिका की जानकारी मिली, उसी रात ट्रेजरी खोलकर उनका रुका हुआ वेतन जारी कर दिया गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें याचिका वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया और लगातार कई जांचों के जरिए मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
अपनी शिकायत में तहसीलदार ने यह भी दावा किया कि सरकारी भूमि के आवंटन में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। उनके अनुसार, करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन को कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से गलत तरीके से वितरित किया गया है।
उन्होंने कहा कि यदि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाए तो एक बड़े भूमि घोटाले का खुलासा हो सकता है।
हालांकि, तहसीलदार के आरोपों के बाद प्रशासनिक पक्ष से विरोध भी सामने आया है। उत्तर प्रदेश मिनिस्टीरियल कलेक्ट्रेट कर्मचारी संघ ने उनके आरोपों को खारिज करते हुए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। संघ ने कहा कि लगाए गए आरोप निराधार हैं और प्रशासनिक व्यवस्था को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है।
संघ के जिला अध्यक्ष ने यह भी कहा कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों पर आरोप लगाए गए हैं, वे भ्रष्टाचार में शामिल नहीं हैं और उनके खिलाफ लगाए गए सभी दावे गलत हैं।
फिलहाल यह मामला प्रशासनिक स्तर पर गंभीर विवाद का रूप ले चुका है और मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया है। मामले की जांच और आगे की कार्रवाई को लेकर सभी की निगाहें अब उच्च स्तरीय निर्णय पर टिकी हैं।
यह प्रकरण राज्य की नौकरशाही में पारदर्शिता, जवाबदेही और आंतरिक शिकायत निवारण प्रणाली पर एक बार फिर सवाल खड़े कर रहा है।
