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फर्जी सिम और बैंक खातों का ‘सुपर नेटवर्क’: 273 केस जोड़कर ₹210 करोड़ की ठगी का खुलासा

Team The420
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गांधीनगर/वडोदरा। देश में बढ़ते साइबर अपराध के बीच गुजरात से एक बड़े संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है, जिसने फर्जी सिम कार्ड और बैंक खातों के सहारे ₹210 करोड़ से अधिक की ठगी को अंजाम दिया। इस मामले में छह आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनका संबंध देशभर में दर्ज 273 साइबर फ्रॉड मामलों से जुड़ा पाया गया है। यह कार्रवाई खुफिया इनपुट के आधार पर वडोदरा में की गई, जहां से पूरे नेटवर्क का संचालन किया जा रहा था।

जांच में सामने आया है कि यह गिरोह सुनियोजित तरीके से बैंक खातों का नेटवर्क तैयार करता था और इन खातों के जरिए ठगी की रकम को तेजी से एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करता था। आरोपी खुद के नाम पर और अन्य लोगों के नाम पर खाते खुलवाते थे, फिर उनसे जुड़े सिम कार्ड और बैंकिंग किट हासिल कर उन्हें आपराधिक गतिविधियों में इस्तेमाल करते थे।

40 खातों से संचालित होता था नेटवर्क

गिरफ्तार आरोपियों में अब्दुल कबीर मोहम्मद इलियास पठान, विवेक वंजारा, मयंक बैरवा, रोहित वर्मा, मोहित रावल और दीपेश राजपुरोहित उर्फ मोंटू शामिल हैं। जांच में सामने आया कि दीपेश राजपुरोहित इस पूरे नेटवर्क का मुख्य संचालक था, जो करीब 40 बैंक खातों को नियंत्रित कर रहा था।

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अन्य आरोपी अलग-अलग भूमिकाओं में सक्रिय थे। कोई नए खाते खुलवाने का काम करता था, तो कोई सिम कार्ड उपलब्ध कराता था। कुछ आरोपी बैंक और एटीएम के जरिए रकम निकालने का काम संभालते थे। इस तरह पूरे नेटवर्क में काम का स्पष्ट बंटवारा था, जिससे ठगी की रकम को तेजी से घुमाया जा सके और जांच एजेंसियों से बचा जा सके।

273 मामलों से जुड़े तार, ₹210 करोड़ का ट्रेल

जब्त किए गए मोबाइल फोन, बैंकिंग दस्तावेज और डिजिटल डिवाइस की जांच में इस नेटवर्क के तार देशभर में दर्ज 273 साइबर फ्रॉड मामलों से जुड़े मिले हैं। शुरुआती आकलन के अनुसार, इन मामलों में कुल ₹2,10,70,52,247 की ठगी की गई है।

छापेमारी के दौरान आरोपियों के पास से 11 मोबाइल फोन, 12 चेकबुक, 5 पासबुक, 39 डेबिट कार्ड, एक लैपटॉप और 10 क्यूआर कोड बरामद किए गए। इसके अलावा मोबाइल फोन से 50 से अधिक बैंक खातों की जानकारी मिली है, जिनका इस्तेमाल इंटरस्टेट और अंतरराष्ट्रीय गिरोहों के साथ मिलकर किया जा रहा था।

डिजिटल अरेस्ट, UPI और गेमिंग फ्रॉड का इस्तेमाल

जांच में यह भी सामने आया है कि यह नेटवर्क कई तरह की साइबर ठगी को अंजाम दे रहा था। इसमें डिजिटल अरेस्ट स्कैम, निवेश फ्रॉड, UPI फ्रॉड, लोन फ्रॉड, पार्ट-टाइम जॉब स्कैम और ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े धोखाधड़ी के मामले शामिल हैं।

“आज के साइबर अपराधी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए लोगों का भरोसा जीतते हैं और फिर उन्हें मानसिक दबाव में लाकर पैसे ट्रांसफर कराते हैं। इस तरह के नेटवर्क बेहद संगठित और खतरनाक हो चुके हैं,” ऐसा कहना है प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का।

देशभर और विदेशों तक फैले नेटवर्क के संकेत

जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह गिरोह केवल गुजरात तक सीमित नहीं था। इसके तार कई अन्य राज्यों के साथ-साथ विदेशों से जुड़े होने की भी आशंका है। साइबर अपराधियों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म और बैंकिंग सिस्टम का इस्तेमाल कर पूरे देश में लोगों को निशाना बनाया।

प्रारंभिक जांच में यह भी पता चला है कि ठगी की रकम को ‘म्यूल अकाउंट’ के जरिए तेजी से अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया जाता था, जिससे पैसे को ट्रेस करना बेहद मुश्किल हो जाता था।

जांच जारी, और खुलासों की उम्मीद

फिलहाल मामले की जांच जारी है और एजेंसियां इस नेटवर्क से जुड़े अन्य सदस्यों और इसके अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन का पता लगाने में जुटी हैं। अधिकारियों का मानना है कि इस केस में आगे और बड़े खुलासे हो सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराध अब व्यक्तिगत स्तर से निकलकर संगठित नेटवर्क का रूप ले चुका है। ऐसे में इसे रोकने के लिए तकनीकी उपायों के साथ-साथ जागरूकता और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है।

निष्कर्ष

₹210 करोड़ की इस साइबर ठगी ने एक बार फिर डिजिटल सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। फर्जी सिम कार्ड, बैंक खाते और आधुनिक तकनीक के सहारे चल रहे ऐसे नेटवर्क आम लोगों के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। जब तक मजबूत निगरानी, तेज कार्रवाई और जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक इस तरह के साइबर अपराधों पर पूरी तरह नियंत्रण पाना चुनौती बना रहेगा।

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