अमेरिका-चीन व्यापार तनाव के बीच टैरिफ से बचने के कथित जुगाड़ ने अमेरिकी कारोबार जगत में नई हलचल पैदा कर दी है। उद्योग जगत के दावों के मुताबिक, चीन से आने वाले कुछ शिपमेंट्स में फर्जी इंपोर्टर, कम वैल्यू डिक्लेरेशन और शेल कंपनियों का इस्तेमाल कर ड्यूटी बायपास की कोशिशें बढ़ी हैं। इसका सीधा असर उन अमेरिकी कंपनियों पर पड़ रहा है, जो नियमों के तहत टैरिफ चुकाकर आयात करती हैं।
मामले को लेकर उद्योग संगठनों और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों ने इसे ‘ट्रेड फ्रॉड’ का बढ़ता पैटर्न बताया है। हालिया ट्रेड डेटा में चीन द्वारा बताए गए निर्यात और अमेरिकी कस्टम में दर्ज आयात के बीच 112 अरब डॉलर (करीब ₹10.2 लाख करोड़) का अंतर सामने आया है। विश्लेषकों का कहना है कि इतना बड़ा गैप असामान्य है और यह संकेत देता है कि कुछ माल पूर्ण टैरिफ भुगतान के बिना दाखिल हुआ हो सकता है। हालांकि, रिपोर्टिंग पद्धति और टैक्स रिबेट जैसे कारक भी अंतर की वजह बनते हैं।
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अमेरिकी कंपनियों पर 10-20% रिटेल नुकसान
अमेरिकी लॉन-एंड-गार्डन उपकरण बनाने वाली एक कंपनी के प्रमुख माइकल केर्सी का कहना है कि टैरिफ चोरी का असर खुद टैरिफ से ज्यादा नुकसानदेह है। उनकी कंपनी ने पिछले वर्ष चीनी आयात पर 45% तक ड्यूटी चुकाई। उनका तर्क है कि जो प्रतिस्पर्धी कथित तौर पर इन लागतों से बच जाते हैं, उन्हें कीमत तय करने में 10%–20% तक का रिटेल एडवांटेज मिल जाता है, जिससे नियम मानने वाली फर्मों का मार्केट शेयर दबाव में आता है।
उद्योग के भीतर यह भी चर्चा है कि कुछ विज्ञापनों में चीन से अमेरिका तक $0.70 प्रति किलो तक “ऑल-इन” शिपिंग का दावा किया जा रहा है। विशेषज्ञ इसे रेड फ्लैग मानते हैं, क्योंकि टैरिफ उत्पाद की वैल्यू पर आधारित होते हैं, वजन पर नहीं। ऐसे ऑफर्स में अक्सर डिलीवर्ड ड्यूटी पेड (DDP) मॉडल का उल्लेख होता है, जिसमें विदेशी विक्रेता कस्टम क्लियरेंस और ड्यूटी भुगतान संभालता है। DDP वैध है, लेकिन धोखाधड़ी तब होती है जब माल की वैल्यू कम दिखाई जाए, गलत क्लासिफिकेशन किया जाए या रिकॉर्ड के इंपोर्टर के रूप में शेल कंपनियों का इस्तेमाल हो।
शेल फर्मों से जांच में बाधा, ट्रंप टास्क फोर्स
पूर्व कस्टम अधिकारियों का कहना है कि नॉन-रेजिडेंट इंपोर्टर या शेल फर्मों के जरिए संरचना बनाना आसान है। जांच के समय अक्सर फर्जी पते या बंद हो चुकी कंपनियां मिलती हैं, जिससे प्रवर्तन मुश्किल हो जाता है। कम फाइनेंशियल गारंटी के साथ बनी इकाइयां कार्रवाई से पहले गायब हो सकती हैं, और अंततः अनुपालन जांच का बोझ वैध अमेरिकी कंपनियों पर आ गिरता है।
नीतिगत मोर्चे पर भी हलचल है। प्रशासन ने 2025 में ट्रेड फ्रॉड टास्क फोर्स का गठन किया और व्हिसलब्लोअर कार्यक्रम शुरू किया। संदिग्ध शिपमेंट्स की पहचान के लिए एआई टूल्स के इस्तेमाल को बढ़ाया गया है। साथ ही, विदेशी इंपोर्टर्स के लिए एसेट आवश्यकताओं को सख्त करने और वैल्यूएशन नियमों की समीक्षा जैसे प्रस्तावों पर चर्चा चल रही है।
घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को खतरा, समाधान सुझाव
उद्योग जगत का कहना है कि यदि टैरिफ बायपास का यह समानांतर इकोसिस्टम बढ़ता रहा, तो घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन देने की नीति कमजोर पड़ सकती है। लागत में 40%–50% तक की कथित बचत कीमतों में आक्रामक कटौती में बदल सकती है, जिससे ईमानदार खिलाड़ियों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाएगी।
विशेषज्ञों के मुताबिक, समाधान सख्त प्रवर्तन, पारदर्शी वैल्यूएशन और क्रॉस-बॉर्डर डेटा समन्वय में है। व्यापार नीतियों की प्रभावशीलता तभी बनी रह सकती है, जब अनुपालन करने वालों को दंडित होने का अहसास न हो और नियम तोड़ने वालों पर त्वरित व ठोस कार्रवाई हो।
