रायपुर में फर्जी लोन दिलाने के नाम पर दस्तावेज लेकर पीड़ित के नाम पर ₹27.5 लाख का कर्ज उठाकर ठगी करने वाले आरोपी गिरफ्तार

फर्जी गारंटी, असली नुकसान: सरकारी फंड पर हाईटेक फ्रॉड का हमला

Team The420
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अहमदाबाद/इंदौर। बैंक गारंटी के नाम पर किए गए एक बड़े वित्तीय घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कड़ी कार्रवाई करते हुए ₹10.80 करोड़ की संपत्तियां अस्थायी रूप से कुर्क कर ली हैं। यह कार्रवाई ₹202.01 करोड़ के कथित बैंक गारंटी फ्रॉड मामले में की गई है, जिसमें एक निजी कंपनी और उसके प्रमोटर्स पर सरकारी एजेंसियों को फर्जी दस्तावेजों के जरिए गुमराह कर भारी रकम हासिल करने का आरोप है।

जांच के मुताबिक, कुर्क की गई संपत्तियों में कुल नौ अचल संपत्तियां शामिल हैं, जिनमें रिहायशी फ्लैट और एक कमर्शियल यूनिट शामिल है। ये संपत्तियां मध्य प्रदेश के इंदौर और गुजरात के अहमदाबाद में स्थित हैं और इन्हें अपराध से अर्जित आय से खरीदा गया बताया जा रहा है। यह कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक कानून (PMLA), 2002 के तहत की गई है।

मामले की जांच में सामने आया है कि संबंधित कंपनी—टीरथ गोपिकॉन लिमिटेड (TGL)—ने सरकारी एजेंसियों से ठेके हासिल करने के लिए फर्जी बैंक गारंटी तैयार करवाई और उन्हें आधिकारिक दस्तावेजों के रूप में पेश किया। इन नकली गारंटियों के आधार पर कंपनी ने ₹202 करोड़ से अधिक की अग्रिम राशि सरकारी फंड से हासिल कर ली। यह पूरा नेटवर्क सुनियोजित तरीके से कई स्तरों पर संचालित किया गया, जिसमें दस्तावेजों की जालसाजी, डिजिटल छेड़छाड़ और संस्थागत प्रक्रियाओं के दुरुपयोग का सहारा लिया गया।

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जांच एजेंसियों के अनुसार, इस घोटाले में बैंक अधिकारियों समेत कई अन्य लोगों की मिलीभगत होने की आशंका है। आरोप है कि कंपनी के प्रबंधन ने पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा के नाम पर फर्जी गारंटी तैयार कर उन्हें मध्य प्रदेश जल निगम मर्यादित (MPJNM) और राजस्थान रिन्यूएबल एनर्जी कॉर्पोरेशन लिमिटेड (RRECL) को सौंपा। इन दस्तावेजों को वैध दिखाने के लिए डिजिटल माध्यमों का भी सुनियोजित इस्तेमाल किया गया।

इस घोटाले का एक अहम हिस्सा “pnb-india.co” नामक स्पूफ डोमेन था, जिसे असली बैंक के ईमेल सिस्टम की तरह दिखाने के लिए डिजाइन किया गया। इसी फर्जी डोमेन के जरिए सरकारी एजेंसियों को वेरिफिकेशन ईमेल भेजे गए, जिससे उन्हें यह भरोसा दिलाया गया कि बैंक गारंटी पूरी तरह वास्तविक है। इसी भ्रम के आधार पर संबंधित विभागों ने करोड़ों रुपये का भुगतान जारी कर दिया।

जांच में यह भी सामने आया है कि कंपनी के खातों से लगभग ₹22.12 करोड़ की राशि को अन्य खातों में ट्रांसफर किया गया, जिसमें आरोपियों और उनके परिवार के सदस्यों के व्यक्तिगत खाते भी शामिल हैं। इसके बाद इस रकम को कई स्तरों पर लेयरिंग के जरिए घुमाया गया, ताकि इसकी असली उत्पत्ति को छिपाया जा सके। अंततः इस धन को अचल संपत्तियों में निवेश कर वैध दिखाने की कोशिश की गई।

इस मामले में समानांतर जांच के तहत केंद्रीय जांच एजेंसी ने कई आरोपियों को गिरफ्तार भी किया है। इनमें कंपनी के शीर्ष प्रबंधन से जुड़े लोग शामिल हैं। उनके खिलाफ विशेष अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, जिसमें धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल वित्तीय धोखाधड़ी नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वास के दुरुपयोग का भी बड़ा उदाहरण है। बैंकिंग प्रणाली और सरकारी एजेंसियों के बीच भरोसे की जिस कड़ी पर यह पूरी व्यवस्था आधारित होती है, उसी का फायदा उठाकर इस तरह के घोटालों को अंजाम दिया गया। डिजिटल तकनीकों के इस्तेमाल ने इस अपराध को और अधिक जटिल बना दिया है।

जांच एजेंसियों का कहना है कि इस मामले में अभी और लोगों की संलिप्तता सामने आ सकती है। फिलहाल एजेंसियां सभी वित्तीय लेनदेन की गहराई से जांच कर रही हैं और यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लाभार्थी कौन-कौन हैं।

यह मामला एक बार फिर यह संकेत देता है कि बड़े वित्तीय लेनदेन और सरकारी ठेकों में सत्यापन प्रक्रिया को और मजबूत करने की आवश्यकता है। साथ ही डिजिटल सिस्टम में सुरक्षा खामियों को दूर करना भी बेहद जरूरी है, ताकि इस तरह के संगठित आर्थिक अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सके। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, यह साफ होता जा रहा है कि तकनीक और संस्थागत पहुंच का दुरुपयोग कर बड़े स्तर पर आर्थिक अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है—और इन्हें रोकने के लिए सख्त निगरानी और त्वरित कार्रवाई ही सबसे प्रभावी उपाय है।

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