दिल्ली हाईकोर्ट: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा—अमेरिका तलाक बाद भारत दहेज केस रद्द, कानूनी दुरुपयोग।

अमेरिका में तलाक के बाद भारत में दहेज मामला नहीं चलेगा: दिल्ली हाईकोर्ट

Team The420
6 Min Read

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पति-पत्नी के बीच विदेश में आपसी सहमति से तलाक हो चुका है और सभी विवादों का निपटारा हो गया है, तो उसी आधार पर भारत में दोबारा आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने अमेरिका में तलाक के बाद दिल्ली में दर्ज कराए गए दहेज उत्पीड़न के मामले को रद्द करते हुए इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने उस याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया, जिसमें पति ने अपने और अपने परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने पूरे घटनाक्रम का परीक्षण करने के बाद कहा कि भारत में आपराधिक कार्रवाई जारी रखना विधिसम्मत नहीं है।

अदालत के समक्ष रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार, दंपति का विवाह जुलाई 2017 में दिल्ली में हुआ था। विवाह के बाद दोनों अमेरिका चले गए और वहीं साथ रहने लगे। लगभग दो वर्ष बाद उनके बीच वैवाहिक मतभेद उत्पन्न हुए। 17 मई 2019 को पति ने अमेरिका की अदालत में तलाक की अर्जी दायर की।

इसके कुछ दिन बाद, 27 मई 2019 को पत्नी ने अमेरिकी अधिकारियों के समक्ष घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराई। जांच के बाद स्थानीय पुलिस ने कथित रूप से पति को पीड़ित माना और पत्नी को संक्षिप्त रूप से हिरासत में लिया, हालांकि बाद में उसे रिहा कर दिया गया। पति ने उसके खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई। पत्नी द्वारा की गई दूसरी शिकायत में भी पति के विरुद्ध आरोप सिद्ध नहीं हो सके।

इसी बीच अगस्त 2019 में पत्नी ने दिल्ली में भी घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न से संबंधित शिकायतें दर्ज कराईं। अंततः जनवरी 2020 में अमेरिका की अदालत में दोनों ने आपसी सहमति से तलाक ले लिया। समझौते के तहत भरण-पोषण और अन्य वैवाहिक दावों के निपटारे के लिए एकमुश्त राशि का भुगतान किया गया।

करीब एक वर्ष बाद, दिसंबर 2020 में पत्नी ने दिल्ली में प्राथमिकी दर्ज कराते हुए पति और उसके परिवार के सदस्यों पर दहेज उत्पीड़न के आरोप लगाए। इसी के विरुद्ध पति ने हाईकोर्ट का रुख किया।

FCRF Launches Flagship Certified Fraud Investigator (CFI) Program

दोहरी कार्रवाई पर अदालत की आपत्ति

हाईकोर्ट ने अमेरिकी अदालत में दायर दस्तावेजों और समझौते की शर्तों का अवलोकन करते हुए पाया कि तलाक की कार्यवाही के दौरान पत्नी ने स्वयं कहा था कि सभी वैवाहिक विवाद सुलझ चुके हैं। अदालत ने कहा कि एक बार जब व्यापक समझौता हो गया और उस पर अमल भी हो चुका, तब उन्हीं आरोपों को भारत में आपराधिक मुकदमे के माध्यम से दोबारा उठाना स्वीकार्य नहीं है।

पीठ ने टिप्पणी की कि कोई भी पक्ष एक ओर समझौते का लाभ उठाए और दूसरी ओर उसी कारण से आपराधिक कार्रवाई जारी रखे, यह कानून की दृष्टि में मान्य नहीं है। ऐसा आचरण विधिक सिद्धांतों के विपरीत है।

अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि संबंधित अवधि में दंपति अमेरिका में रह रहे थे, इसलिए यदि कोई कथित घरेलू हिंसा या उत्पीड़न हुआ भी होगा, तो वह वहीं घटित हुआ होगा। उस संबंध में वहां विधिक प्रक्रिया अपनाई गई और अंततः आपसी सहमति से तलाक का आदेश पारित हुआ।

प्रक्रिया का दुरुपयोग माना

हाईकोर्ट ने माना कि समान कथित वैवाहिक अपराधों के आधार पर भारत में आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उपयोग पहले से निपटाए जा चुके विवादों को पुनर्जीवित करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।

निर्णय में इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना गया कि अमेरिकी अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों में पत्नी ने यह स्वीकार किया था कि सभी विवादों का समाधान हो चुका है। ऐसे में वही आरोप भारत में दोबारा उठाना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया।

व्यापक प्रभाव

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अंतरराष्ट्रीय विवाहों से जुड़े विवादों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेगा। अदालत ने यह संकेत दिया है कि एक ही विवाद को दो अलग-अलग देशों में समान आधार पर आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, विशेषकर तब जब एक सक्षम विदेशी अदालत में समझौता और तलाक का आदेश पारित हो चुका हो।

यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया की अंतिमता और पारदर्शिता के सिद्धांत को मजबूत करता है तथा सीमा-पार वैवाहिक विवादों में अनावश्यक दोहराव को हतोत्साहित करता है।

हमसे जुड़ें

Share This Article