दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने एक निजी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) में हुए बड़े कॉर्पोरेट लोन घोटाले के खिलाफ निर्णायक कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। प्रवर्तन अधिकारियों ने गहन तकनीकी जांच के बाद वित्तीय संस्थान के आधिकारिक गोल्ड अप्रेज़र पंकज कुमार को हिरासत में ले लिया है। इस कार्रवाई से एक ऐसे संगठित अंतर-राज्यीय नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ है जिसने फर्जी पहचान पत्रों और नकली आभूषणों के सहारे वित्तीय संस्थान की सुरक्षा प्रणाली में सेंध लगाकर करोड़ों रुपये की पूंजी अवैध रूप से बाहर निकाली।
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जाली दस्तावेजों का जाल और काल्पनिक खातों का निर्माण
इस पूरे आर्थिक अपराध की रूपरेखा को अंजाम देने के लिए जालसाज नेटवर्क ने वित्तीय संस्थान की डिजिटल ऋण प्रणालियों की कमियों का फायदा उठाया। जांच अधिकारियों के अनुसार, यह सुनियोजित धोखाधड़ी मुख्य रूप से वर्ष 2022 से 2025 के बीच संचालित की गई थी।
इस संगठित गिरोह ने ऋण स्वीकृति की पूरी प्रक्रिया को तीन लगातार परिचालन चरणों के माध्यम से प्रबंधित किया। ऑपरेटरों ने सबसे पहले बाजार से अनधिकृत डेटा एकत्र कर विभिन्न व्यक्तियों के जाली केवाईसी दस्तावेज और नकली पहचान पत्र तैयार किए। इसके बाद इन काल्पनिक उधारकर्ताओं के नाम पर संस्थान के लोन प्रबंधन सिस्टम में कुल 683 फर्जी ग्राहक खाते सक्रिय किए गए। अंतिम चरण में इन खातों के आधार पर लगभग ₹3.81 करोड़ के गोल्ड लोन स्वीकृत कराकर पूरी राशि को सुनियोजित तरीके से अलग-अलग बैंक खातों में स्थानांतरित कर दिया गया और कंपनी की पूंजी का गबन कर लिया गया।
नकली सोने का प्रमाणीकरण और तिजोरी से आभूषणों की चोरी
इस बैंकिंग घोटाले का सबसे गंभीर पहलू वित्तीय संस्थान के भीतर बैठे अंदरूनी अधिकारियों की मिलीभगत रही। गिरफ्तार आरोपी पंकज कुमार कंपनी में गोल्ड अप्रेज़र के पद पर तैनात था, जिसका प्राथमिक दायित्व गिरवी रखे जाने वाले सोने की शुद्धता और वजन की जांच करना था। उसने अपने इस भरोसे का फायदा उठाते हुए तांबे और पीतल की मिश्र धातुओं से बने नकली आभूषणों को असली सोने के रूप में प्रमाणित करने वाली फर्जी मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार कीं।
इस धोखाधड़ी की परतें तब और गहरी हो गईं जब कंपनी द्वारा कराए गए एक विशेष आंतरिक ऑडिट में यह सामने आया कि जालसाजों ने न केवल नकली सोना जमा कराया, बल्कि तिजोरी में रखे असली आभूषणों को भी निशाना बनाया। ऑडिट दल ने पाया कि पहले से गिरवी रखे गए लगभग ₹14.11 लाख मूल्य के असली सोने के आभूषणों के पैकेट मुख्य लॉकर से पूरी तरह गायब थे। जांचकर्ताओं को संदेह है कि आरोपी ने असली सोने को निकालकर उसकी जगह नकली आभूषण रख दिए थे ताकि दैनिक निरीक्षण के दौरान किसी को भी इस भौतिक अदला-बदली का संदेह न हो।
ऑडिट से बचने की तरकीबें और पुलिस की जांच का दायरा
आर्थिक अपराध शाखा की जांच में यह भी सामने आया है कि जालसाज गिरोह कंपनी के स्वचालित अलर्ट सिस्टम को धोखा देने के लिए बेहद शातिर हथकंडे अपना रहा था। आरोपी और उसके सहयोगी इन फर्जी लोन खातों में नियमित अंतराल पर ब्याज की आंशिक राशि जमा करते रहते थे। ऐसा करने से ये सभी खाते बैंकिंग सॉफ्टवेयर में पूरी तरह सक्रिय और नियमित श्रेणी में दिखाई देते रहे, जिससे कंपनी के उच्च प्रबंधन को लंबे समय तक इस भारी वित्तीय नुकसान की भनक नहीं लगी।
अगस्त 2025 में दर्ज हुई प्राथमिकी के बाद आर्थिक अपराध शाखा ने बैंक स्टेटमेंट, ऋण फाइलों और डिजिटल लॉग्स की फॉरेंसिक मैपिंग शुरू की। पुलिस की टीमें अब उस पूरे धन प्रवाह (मनी ट्रेल) को ट्रैक कर रही हैं जिसके जरिए गबन की गई राशि को अलग-अलग बैंक खातों में ले जाया गया था। अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि इस मामले में कई अन्य तकनीकी सहायकों और हवाला ऑपरेटरों की भूमिका की जांच की जा रही है, और आने वाले दिनों में कुछ और बड़ी गिरफ्तारियां संभव हैं।
शून्य-विश्वास सत्यापन प्रणालियां और भविष्य के सुरक्षा सुधार
इस बहु-करोड़ रुपये के गोल्ड लोन घोटाले ने देश के गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र में सुरक्षा मानकों और ऑडिट प्रक्रियाओं को तुरंत अपग्रेड करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। फ्यूचर क्राइम Research फाउंडेशन (FCRF) के सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि केवल एक अप्रेज़र के हस्ताक्षर और भौतिक रिपोर्ट पर अत्यधिक निर्भरता वित्तीय संस्थानों के लिए एक बड़ा आंतरिक जोखिम बनती जा रही है।
भविष्य में ऐसे आर्थिक अपराधों को रोकने के लिए वित्तीय सुरक्षा बोर्ड अब शून्य-विश्वास (ज़ीरो-ट्रस्ट) सत्यापन प्रणालियों को अनिवार्य करने की सलाह दे रहे हैं। इसके तहत गिरवी रखी जाने वाली प्रत्येक संपत्ति का किसी स्वतंत्र तीसरी एजेंसी से दोबारा मूल्यांकन कराया जाना चाहिए और सभी सोने के पैकेजों को डिजिटल ट्रैकिंग टैग्स के साथ सुरक्षित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, पहचान दस्तावेजों के रियल-टाइम बायोमेट्रिक सत्यापन को ऋण प्रबंधन प्रणालियों से जोड़ना अनिवार्य होगा ताकि काल्पनिक पहचान के आधार पर बनने वाले खातों को शुरुआत में ही ब्लॉक किया जा सके।
