“वरिष्ठ नागरिक को गिरफ्तारी का डर दिखाकर ₹46 लाख की ठगी; मल्टीपल बैंक खातों में घुमाई गई रकम, साइबर नेटवर्क की गहराई में जांच जारी”

“फर्जी नोटिस, नकली अधिकारी और मनोवैज्ञानिक दबाव: डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में गुजरात कनेक्शन उजागर”

Roopa
By Roopa
5 Min Read

चंडीगढ़। देश में तेजी से फैल रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर फ्रॉड का एक और बड़ा मामला सामने आया है, जिसमें चंडीगढ़ साइबर क्राइम पुलिस ने गुजरात से जुड़े तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि इस गिरोह ने खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसी का अधिकारी बताकर एक वरिष्ठ नागरिक को डराया और उसे लगातार मानसिक दबाव में रखकर कुल ₹46 लाख की ठगी कर ली।

पुलिस जांच के अनुसार, यह पूरा मामला मार्च 2026 में दर्ज एक शिकायत से शुरू हुआ, जिसमें पीड़ित ने बताया कि उसे अज्ञात नंबरों से लगातार कॉल आ रहे थे। कॉल करने वालों ने खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताया और कहा कि उसके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज है। इसके बाद पीड़ित को गिरफ्तारी की धमकी देकर लगातार दबाव बनाया गया, जिससे वह मानसिक रूप से टूट गया और उनके निर्देशों का पालन करने लगा।

ठगों ने इस दौरान ‘डिजिटल अरेस्ट’ का एक पूरा नाटक रचा, जिसमें पीड़ित को यह यकीन दिलाया गया कि वह जांच के दायरे में है और उसे किसी भी समय गिरफ्तार किया जा सकता है। इसके साथ ही उसे डराने के लिए फर्जी कानूनी नोटिस, केस नंबर और डिजिटल दस्तावेज भी भेजे गए, जिन्हें देखकर पीड़ित को यह सब वास्तविक लगा।

जांच में सामने आया कि आरोपियों ने पीड़ित को अलग-अलग बैंक खातों में कई किस्तों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया। इस दौरान उसे यह भी कहा गया कि यह राशि जांच प्रक्रिया का हिस्सा है और बाद में वापस कर दी जाएगी। लेकिन रकम मिलते ही इसे अलग-अलग खातों में घुमाकर निकाल लिया गया, जिससे ट्रेसिंग मुश्किल हो गई।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान रमेश अजय भाई अबचुंग, योगेश देवजी महेश्वरी और हितेश नरन बोरीचा के रूप में हुई है, जो गुजरात के गांधीनगर क्षेत्र से जुड़े बताए जा रहे हैं। प्रारंभिक जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि यह केवल एक छोटा हिस्सा हो सकता है, जबकि इसके पीछे एक बड़ा संगठित साइबर फ्रॉड नेटवर्क सक्रिय है जो कई राज्यों में काम कर रहा है।

FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference

साइबर क्राइम अधिकारियों के अनुसार, इस गिरोह की कार्यप्रणाली बेहद सुनियोजित थी। पहले पीड़ित को डराया जाता था, फिर उसे अलग-थलग कर दिया जाता था ताकि वह किसी और से सलाह न ले सके। इसके बाद मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर तत्काल भुगतान के लिए मजबूर किया जाता था। यह पूरी प्रक्रिया ‘सोशल इंजीनियरिंग’ तकनीक पर आधारित थी, जिसमें तकनीक से ज्यादा मानसिक नियंत्रण का उपयोग किया जाता है।

इस मामले पर प्रख्यात साइबर क्राइम विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे फ्रॉड आज के समय में सबसे खतरनाक साइबर अपराधों में से एक बन चुके हैं। उन्होंने कहा, “अपराधी अब तकनीक से ज्यादा मनोविज्ञान का उपयोग कर रहे हैं। वे पहले डर पैदा करते हैं, फिर पीड़ित को सूचना और सोचने के सभी रास्तों से काट देते हैं। यही कारण है कि शिक्षित और वरिष्ठ नागरिक भी इस तरह के जाल में फंस जाते हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के मामलों में सबसे जरूरी है जागरूकता और त्वरित सत्यापन। कोई भी सरकारी एजेंसी फोन पर गिरफ्तारी या भुगतान की मांग नहीं करती, और ऐसे किसी भी कॉल को तुरंत संदेह की नजर से देखना चाहिए।

पुलिस ने बताया कि इस मामले में इस्तेमाल किए गए बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल लेनदेन की गहन जांच की जा रही है। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस नेटवर्क ने अब तक कितने लोगों को इसी तरह ठगी का शिकार बनाया है।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि कोई भी सरकारी एजेंसी फोन कॉल या वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार नहीं करती और न ही इस तरह पैसे की मांग की जाती है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि ऐसे किसी भी कॉल या संदेश पर भरोसा न करें और तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं।

जांच एजेंसियों का मानना है कि इस तरह के ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड तेजी से बढ़ रहे हैं और इनमें सबसे बड़ा हथियार डर और भ्रम पैदा करना है। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने और इसके अन्य सहयोगियों की पहचान करने में जुटी हुई है।

हमसे जुड़ें

Share This Article