बुलंदशहर: उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर स्थित जिला सहकारी बैंक की मोतीबाग मुख्य शाखा में वर्षों से निष्क्रिय पड़े खातों से ₹53 लाख से अधिक की कथित धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। प्रारंभिक जांच में आरोप है कि बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से 96 बंद खातों की फर्जी केवाईसी (नो योर कस्टमर) कर उनमें जमा धनराशि को अन्य बैंक खातों में स्थानांतरित किया गया और कुछ राशि नकद भी निकाल ली गई। मामले की शिकायत मिलने के बाद बैंक प्रशासन ने आंतरिक जांच कराई, जिसमें गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिलने पर चार कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है, जबकि दो अन्य कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए शासन को संस्तुति भेजी गई है। बैंक प्रबंधन अब पूरे प्रकरण की वित्तीय और दस्तावेजी जांच कर रहा है।
बैंक अधिकारियों के अनुसार, अनियमितताओं की जानकारी मिलने पर महाप्रबंधक अनिल कुमार ने तत्काल तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया। समिति ने खातों, लेनदेन, केवाईसी रिकॉर्ड और बैंकिंग दस्तावेजों की जांच शुरू की। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि लंबे समय से निष्क्रिय पड़े 96 खातों के अभिलेखों में कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर केवाईसी अपडेट की गई और इसके बाद खातों से धनराशि निकालने की प्रक्रिया पूरी की गई। जांच में यह भी पाया गया कि निकाली गई राशि का एक हिस्सा अन्य खातों में स्थानांतरित किया गया, जबकि कुछ रकम नकद निकाली गई।
जांच के दौरान ऊंचागांव शाखा से जुड़ा एक और मामला भी सामने आया। अधिकारियों के अनुसार, वहां भी कई वर्षों से निष्क्रिय पड़े एक खाते से लगभग ₹2.20 लाख से अधिक की निकासी किए जाने के संकेत मिले हैं। बैंक अब यह पता लगाने में जुटा है कि दोनों मामलों में अपनाई गई कार्यप्रणाली समान थी या नहीं और क्या इनके पीछे एक ही नेटवर्क सक्रिय था। सभी संदिग्ध खातों के लेनदेन का विस्तृत ऑडिट कराया जा रहा है।
मामले का खुलासा तब हुआ जब खाताधारक वीरपाल सिंह के परिजन बैंक में धन निकासी के लिए पहुंचे। बैंक की पासबुक अपडेट कराने पर उन्हें पता चला कि खाते से पहले ही लगभग ₹1.10 लाख निकाले जा चुके हैं। परिजनों ने बैंक अधिकारियों को बताया कि इस खाते में लंबे समय से कोई लेनदेन नहीं हुआ था और वीरपाल सिंह के पिता का निधन लगभग 13 वर्ष पहले हो चुका था। ऐसे में खाते से धन निकासी की जानकारी मिलने पर उन्होंने आपत्ति दर्ज कराई, जिसके बाद बैंक प्रशासन ने पूरे मामले की जांच शुरू कराई।
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प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में कई बैंक कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाए जाने के बाद प्रशासन ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की। सिकंदराबाद शाखा में तैनात वरिष्ठ शाखा प्रबंधक विशाल प्रताप सिंह, सहायक प्रबंधक चंद्रसैन, लिपिक नितिन कुमार और ऊंचागांव शाखा के वरिष्ठ शाखा प्रबंधक राधेश्याम को निलंबित कर मोतीबाग शाखा से संबद्ध कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त सुपरवाइजर देवेंद्र कुमार और अनिल कुमार के विरुद्ध भी कार्रवाई की संस्तुति करते हुए शासन को पत्र भेजा गया है।
बैंक प्रशासन अब यह जांच कर रहा है कि फर्जी केवाईसी की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी की गई, किन दस्तावेजों का उपयोग किया गया और आंतरिक नियंत्रण प्रणाली में कहां चूक हुई। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि धनराशि जिन खातों में स्थानांतरित की गई, उनके वास्तविक लाभार्थी कौन हैं और क्या इस पूरे प्रकरण में बैंक के बाहर के अन्य व्यक्तियों की भी भूमिका रही है। आवश्यकता पड़ने पर संबंधित बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल लॉग और अन्य दस्तावेजों का तकनीकी परीक्षण भी कराया जाएगा।
प्रारंभिक निष्कर्षों के आधार पर बैंक ने संदिग्ध लेनदेन से जुड़े खातों की निगरानी बढ़ा दी है और सभी निष्क्रिय खातों का पुनः सत्यापन शुरू कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद यदि किसी अन्य कर्मचारी या बाहरी व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है तो उसके विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए केवाईसी सत्यापन, आंतरिक ऑडिट और निगरानी व्यवस्था को और सुदृढ़ किया जाएगा।
बैंक प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जा रही है और प्रत्येक संदिग्ध वित्तीय लेनदेन का रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जांच के अंतिम निष्कर्षों के आधार पर आगे की प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही खाताधारकों से अपील की गई है कि वे समय-समय पर अपने बैंक खातों की प्रविष्टियों की जांच करते रहें और किसी भी संदिग्ध लेनदेन की सूचना तुरंत बैंक अथवा संबंधित प्राधिकरण को दें।
