₹4,000 करोड़ से अधिक के कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में बड़ी राहत देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने GTL लिमिटेड और GTL इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के खिलाफ दर्ज सीबीआई की एफआईआर को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एफआईआर में यह दिखाने वाला कोई ठोस आरोप नहीं है कि कंपनियों ने शुरुआत से ही बेईमानी या धोखाधड़ी की नीयत से ऋण लिया था।
मुख्य न्यायाधीश श्रीयुत चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम ए. अंखाड की पीठ ने 27 फरवरी को दो अलग-अलग फैसलों में 2023 में दर्ज एफआईआर को निरस्त करते हुए कंपनियों की याचिकाएं स्वीकार कर लीं। इन मामलों में अज्ञात निदेशकों, बैंक अधिकारियों, निजी व्यक्तियों, विक्रेताओं और कथित लाभार्थी समूहों के नाम भी शामिल किए गए थे।
जनवरी 2023 में दर्ज एफआईआर में सीबीआई ने आरोप लगाया था कि GTL लिमिटेड ने 24 बैंकों के कंसोर्टियम से ₹4,760.01 करोड़ की विभिन्न क्रेडिट सुविधाएं कथित रूप से धोखाधड़ी के जरिए हासिल कीं। एजेंसी का दावा था कि ऋण की एक बड़ी राशि कथित तौर पर ऐसे विक्रेता संस्थानों को भेजी गई, जिन्हें दुर्भावनापूर्ण इरादे से बनाया और संचालित किया गया। साथ ही यह भी आरोप था कि कंपनी ने ₹1,400 करोड़ की पूंजी गैर-परिवर्तनीय डिबेंचर (एनसीडी) के माध्यम से जुटाई और ऋणदाताओं की राशि का दुरुपयोग करते हुए कथित विक्रेताओं को अग्रिम भुगतान किया।
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अगस्त 2023 में GTL इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के खिलाफ दर्ज अलग एफआईआर में 19 बैंकों और वित्तीय संस्थानों के कंसोर्टियम से लिए गए ऋण में वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाया गया। सीबीआई के अनुसार कुल ₹11,263 करोड़ के ऋण जोखिम में से लगभग ₹7,200 करोड़ को इक्विटी शेयरों में परिवर्तित किया गया, जबकि ₹4,063 करोड़ अभी भी देय बताया गया। एजेंसी ने दावा किया कि कंपनी ने ऋण राशि का बड़ा हिस्सा कथित विक्रेताओं के माध्यम से डायवर्ट किया, जहां सामान की आपूर्ति नहीं हुई और बाद में अग्रिम राशि को बट्टे खाते में डाल दिया गया।
कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि एफआईआर ठोस साक्ष्यों से रहित हैं और व्यावसायिक निर्णयों को आपराधिक रंग देने का प्रयास किया गया है। उनका कहना था कि जब ऋण देने का फैसला बैंकों के सामूहिक निर्णय से लिया गया हो, तो स्पष्ट धोखाधड़ी या आपराधिक मंशा के अभाव में उसे अपराध नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि एफआईआर में यह आरोप नहीं है कि याचिकाकर्ता कंपनियों ने शुरुआत में ही बेईमानी की नीयत रखी या वित्तीय प्रक्षेपण जानबूझकर गलत पेश किए। पीठ ने रेखांकित किया कि आपराधिक मुकदमे के लिए धोखा देने की स्पष्ट और ठोस मंशा का आरोप आवश्यक है, जो इस मामले में अनुपस्थित है।
अदालत ने यह भी कहा कि बैंक कंसोर्टियम के भीतर कुछ बैंकों का असहमति जताना, अपने आप में आपराधिक कृत्य का प्रमाण नहीं है। पुनर्गठन या पुनर्जीवन योजनाओं पर वित्तीय संस्थानों के बीच मतभेद को स्वतः धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।
महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि कंपनियों को या उनके द्वारा किसी को अनुचित लाभ पहुंचाने का कोई प्रमाण नहीं मिला। साथ ही, सार्वजनिक धन को हुए कथित नुकसान को “गलत नुकसान” तभी माना जा सकता है जब जानबूझकर और धोखाधड़ीपूर्ण आचरण सिद्ध हो। अदालत ने यह भी कहा कि जांच एजेंसी निदेशकों के किसी अवैध कृत्य या छल का ठोस आधार प्रस्तुत करने में विफल रही।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आशा में जांच जारी नहीं रखी जा सकती कि भविष्य में कोई अपराध सामने आ जाएगा। फैसले के बाद दोनों कंपनियों को इस लंबे समय से चल रहे मामले में बड़ी राहत मिली है।
