“पाकिस्तान तक जुड़े तार, 10% कमीशन पर काम करते थे आरोपी; सोशल मीडिया और फर्जी कानूनी धमकियों से बनाते थे शिकार”

“‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर करोड़ों की ठगी: बिहार के पूर्वी चंपारण में इंटरनेशनल साइबर गैंग का भंडाफोड़”

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By Roopa
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पटना/पूर्वी चंपारण। साइबर अपराध के बढ़ते खतरे के बीच बिहार के पूर्वी चंपारण जिले से एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क का खुलासा हुआ है। कल्याणपुर थाना क्षेत्र में सक्रिय इस संगठित गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनके तार देश के बाहर तक जुड़े होने की बात सामने आई है। यह कार्रवाई न केवल एक स्थानीय गिरोह को बेनकाब करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि साइबर ठगी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित तरीके से संचालित हो रही है।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान अंकित कुमार, युवराज कुमार, मोहम्मद और चुन्नू कुमार के रूप में हुई है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि ये सभी एक सुव्यवस्थित नेटवर्क का हिस्सा थे और ठगी की गई रकम पर लगभग 10 प्रतिशत कमीशन के आधार पर काम करते थे। यानी जितनी बड़ी ठगी, उतनी बड़ी उनकी कमाई।

पूरे मामले का खुलासा उस समय हुआ जब पुलिस को सूचना मिली कि खटोला गांव निवासी अंकित कुमार संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त है और एक एटीएम के पास देखा गया है। सूचना मिलते ही टीम ने मौके पर पहुंचकर उसे गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ के दौरान अंकित ने पूरे नेटवर्क की परतें खोल दीं, जिसके बाद उसके तीन अन्य साथियों को भी पकड़ लिया गया।

जांच में सामने आया है कि यह गिरोह बेहद चालाकी से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भ्रामक विज्ञापन चलाता था और लोगों को फर्जी कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर अपने जाल में फंसाता था। कई मामलों में उन्होंने ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसमें पीड़ित को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वह किसी गंभीर अपराध में फंस चुका है और उसे गिरफ्तारी से बचने के लिए तुरंत पैसे देने होंगे।

इस पूरे फ्रॉड का सबसे अहम पहलू था ‘डर और दबाव की रणनीति’। आरोपी पहले पीड़ित को मानसिक रूप से अस्थिर करते थे और फिर उसे जल्दी निर्णय लेने के लिए मजबूर करते थे। इसी मनोवैज्ञानिक दबाव के चलते कई लोग बिना सत्यापन किए बड़ी रकम ट्रांसफर कर देते थे।

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जांच एजेंसियों के अनुसार, ठगी की गई रकम को कैश डिपॉजिट मशीन (CDM) के जरिए विदेशी हैंडलर्स तक पहुंचाया जाता था। इसके बदले में आरोपी अपनी तय कमीशन राशि रख लेते थे। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि इस नेटवर्क के कुछ ऑपरेटर्स पाकिस्तान में बैठे हैं, जो पूरे ऑपरेशन को दूर से नियंत्रित करते थे।

पुलिस ने आरोपियों के पास से सात बैंक पासबुक, 10 एटीएम कार्ड, एक लैपटॉप और पांच मोबाइल फोन बरामद किए हैं। ये सभी उपकरण इस बात का संकेत देते हैं कि यह कोई छोटा-मोटा गिरोह नहीं, बल्कि एक संगठित साइबर अपराध सिंडिकेट था। इसके अलावा दो महंगी मोटरसाइकिलें भी जब्त की गई हैं, जिन्हें कथित तौर पर ठगी के पैसों से खरीदा गया था।

जांच में यह भी सामने आया है कि यह गिरोह केवल बिहार तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके नेटवर्क देश के अन्य राज्यों और विदेशों तक फैले हुए थे। ऐसे में एजेंसियां अब इस पूरे सिंडिकेट के बड़े नेटवर्क और अन्य संभावित सदस्यों की तलाश में जुट गई हैं।

साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “डिजिटल अरेस्ट और फर्जी कानूनी नोटिस जैसे तरीके आज के साइबर अपराधियों के सबसे खतरनाक हथियार बन चुके हैं। ये पूरी तरह सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित होते हैं, जहां अपराधी पीड़ित के मन में डर और भ्रम पैदा कर उसे अपने नियंत्रण में ले लेते हैं।”

यह मामला एक बार फिर चेतावनी देता है कि डिजिटल युग में अपराध केवल तकनीक के जरिए नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान का फायदा उठाकर भी किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी अनजान कॉल, मैसेज या ऑनलाइन ऑफर पर तुरंत भरोसा करने से बचना चाहिए और किसी भी तरह की कानूनी धमकी मिलने पर आधिकारिक स्रोतों से सत्यापन करना जरूरी है।

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, यह साफ होता जा रहा है कि साइबर अपराध अब स्थानीय सीमाओं से बाहर निकलकर अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का रूप ले चुके हैं। ऐसे में न केवल कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए चुनौती बढ़ी है, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी सतर्क रहना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।

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