जयपुर में 90 वर्षीय पूर्व जिला जज को कथित तौर पर फर्जी CBI अधिकारी बनकर डिजिटल अरेस्ट में रखकर ₹2.50 करोड़ की ठगी की गई।

तीन महीने तक ‘डिजिटल कैद’, फिर ₹3.17 करोड़ की ठगी; बेंगलुरु में साइबर गिरोह का बड़ा खेल

Team The420
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कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में एक 74 वर्षीय बुजुर्ग और उनकी पत्नी कथित डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का शिकार होकर ₹3.17 करोड़ गंवा बैठे। शिकायत के अनुसार, साइबर जालसाजों ने स्वयं को टेलीकॉम विभाग और पुलिस अधिकारी बताकर दंपती को तीन महीने से अधिक समय तक कथित “डिजिटल अरेस्ट” में रखा और विभिन्न बैंक खातों में ₹3.17 करोड़ से अधिक की राशि ट्रांसफर करा ली। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। मामले में लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

पुलिस के अनुसार, जयनगर प्रथम ब्लॉक निवासी दंपती को 9 मार्च को एक लैंडलाइन नंबर से कॉल आया। कॉल करने वालों ने दावा किया कि उनका लैंडलाइन कनेक्शन आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ है और दो घंटे के भीतर उसे बंद कर दिया जाएगा।

शिकायत के अनुसार, अगले दिन दंपती को फोन पर एक नंबर दबाने के लिए कहा गया, जिसके बाद कॉल पहले खुद को वरिष्ठ टेलीकॉम अधिकारी बताने वाली एक महिला और फिर पुलिस उपाधीक्षक (DySP) के रूप में परिचय देने वाले लोगों को स्थानांतरित कर दी गई।

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आरोप है कि ठगों ने दंपती से कहा कि उनकी व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग, मादक पदार्थों की तस्करी और हवाला लेनदेन में हुआ है तथा उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसके बाद उन्हें कथित “डिजिटल अरेस्ट” में रखते हुए किसी से बात न करने, बिना अनुमति घर से बाहर न निकलने और हर कॉल का तुरंत जवाब देने के निर्देश दिए गए।

शिकायत के अनुसार, वित्तीय सत्यापन के नाम पर आरोपियों ने दंपती से बैंक खातों से जुड़ी जानकारी हासिल की और विभिन्न बैंक खातों में कई किश्तों में रकम ट्रांसफर कराई। आरोप है कि जालसाजों ने उनके आभूषण गिरवी रखकर उसकी राशि भी भेजने के लिए कहा, लेकिन दंपती ने इससे इनकार कर दिया।

दंपती ने कथित तौर पर आरोपियों की बातों पर विश्वास करते हुए अलग-अलग बैंक खातों से कई लेनदेन के माध्यम से कुल ₹3,17,80,000 विभिन्न लाभार्थी खातों में ट्रांसफर कर दिए।

मामले का खुलासा तब हुआ जब आरोपी बार-बार “आयकर क्लीयरेंस” की प्रक्रिया पूरी होने का बहाना बनाकर पैसे लौटाने में देरी करते रहे और अंततः संपर्क करना बंद कर दिया। इसके बाद दंपती को अपने साथ हुई कथित ठगी का अहसास हुआ और उन्होंने पुलिस से संपर्क किया।

Algoritha Security के एक शोधकर्ता ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी में साइबर अपराधी पुलिस, जांच एजेंसियों या सरकारी अधिकारियों का रूप धारण कर भय और गोपनीयता का माहौल बनाते हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर धन ट्रांसफर करने का निर्देश नहीं देती। ऐसे मामलों से बचने के लिए नागरिकों को किसी भी धमकी भरे कॉल की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए, बैंकिंग या ओटीपी संबंधी जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए तथा संदेह होने पर तुरंत साइबर पुलिस से संपर्क करना चाहिए।

पुलिस ने बताया कि मामले की जांच जारी है। ठगी में इस्तेमाल किए गए बैंक खातों, धन के प्रवाह और टेलीकॉम तथा पुलिस अधिकारी बनकर संपर्क करने वाले व्यक्तियों की पहचान की जा रही है। उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों, बैंकिंग रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी तथ्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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