पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी लक्ष्मी नारायण ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि उनके द्वारा ट्रस्ट को भेंट की गई लगभग ₹5 करोड़ मूल्य की स्वर्णमढ़ित रामचरितमानस मंदिर परिसर से गायब हो गई है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ग्रंथ सौंपे जाने के समय उन्हें उसकी कोई रसीद भी नहीं दी गई।
लक्ष्मी नारायण के अनुसार, उन्होंने 8 अप्रैल 2024 को यह विशेष रामचरितमानस श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सौंपी थी। उनका कहना है कि इस ग्रंथ का वजन लगभग सवा क्विंटल था और इसके करीब 1,000 पृष्ठों पर सोने की परत चढ़ी हुई थी। उन्होंने दावा किया कि यह ग्रंथ उनकी जीवनभर की पूंजी से तैयार कराया गया था और इसकी अनुमानित कीमत करीब ₹5 करोड़ थी।
पूर्व गृह सचिव का आरोप है कि जब वह इस ग्रंथ को अयोध्या में ट्रस्ट को सौंपने पहुंचे, तो उन्हें ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से मिलने के लिए लगभग दो घंटे तक इंतजार करना पड़ा। मुलाकात के दौरान उन्होंने अनुरोध किया कि इस बहुमूल्य धार्मिक ग्रंथ को मंदिर में सुरक्षित रखा जाए।
उनके अनुसार, उन्हें बताया गया कि ट्रस्ट को श्रद्धालुओं से बड़ी संख्या में आभूषण और अन्य भेंट प्राप्त होती हैं, इसलिए सभी वस्तुओं को प्रदर्शित करना संभव नहीं है।
लक्ष्मी नारायण ने आगे आरोप लगाया कि दान देने के तीन से चार महीने बाद जब उन्होंने रामचरितमानस के बारे में जानकारी ली, तो उन्हें बताया गया कि वह मंदिर में उपलब्ध नहीं है। उनका कहना है कि इसके बाद उन्होंने मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा और ट्रस्ट सदस्य गोपाल राव से भी संपर्क किया, लेकिन कोई संतोषजनक समाधान नहीं मिला। उन्होंने यह भी दावा किया कि चंपत राय से दोबारा मुलाकात के दौरान भी उन्हें ग्रंथ के संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।
निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए लक्ष्मी नारायण ने इस मामले में विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच कराने का अनुरोध किया है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद सुधाकर सिंह ने भी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में कथित वित्तीय अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच कराने के लिए उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है, ताकि श्रद्धालुओं के दान और ट्रस्ट की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
हालांकि, ये आरोप फिलहाल शिकायतकर्ता के दावे हैं। इनकी न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है और मामले में संबंधित ट्रस्ट अथवा सक्षम प्राधिकारियों की ओर से जांच तथा आधिकारिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है।
