नई दिल्ली। उद्योगपति अनिल अंबानी और रिलायंस कम्युनिकेशंस को सुप्रीम कोर्ट से गुरुवार को बड़ा झटका लगा, जब शीर्ष अदालत ने उनके ऋण खातों को ‘फ्रॉड’ घोषित किए जाने के मामले में किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस चरण पर बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं करेगी, जिससे बैंकों द्वारा आगे की कार्रवाई का रास्ता खुला रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणियों का असर अनिल अंबानी द्वारा दायर की गई उन दीवानी याचिकाओं पर नहीं पड़ेगा, जिनमें उन्होंने फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट और उसके आधार पर किए गए फ्रॉड वर्गीकरण को चुनौती दी है। अदालत ने मामले की सुनवाई को तेजी से आगे बढ़ाने के निर्देश देते हुए सभी पक्षों से सहयोग की अपेक्षा जताई।
सुनवाई के दौरान अनिल अंबानी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि किसी भी व्यक्ति या कंपनी के खातों को ‘फ्रॉड’ घोषित किया जाना गंभीर परिणाम पैदा करता है और यह वित्तीय तथा कारोबारी प्रतिष्ठा को पूरी तरह प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि इससे बाजार में उधार लेने की क्षमता लगभग समाप्त हो जाती है, जो किसी भी कंपनी के लिए ‘सिविल डेथ’ के समान स्थिति होती है।
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हालांकि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले में गंभीर आरोप शामिल हैं और जांच प्रक्रिया जारी है। अदालत ने यह भी माना कि बैंकों ने अपने विवेक से विशेषज्ञ एजेंसी की सेवाएं ली हैं और उनके निर्णयों को बिना ठोस आधार पर चुनौती देना उचित नहीं होगा।
सॉलिसिटर जनरल ने सुनवाई के दौरान अदालत को बताया कि संबंधित फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट एक प्रतिष्ठित एजेंसी द्वारा तैयार की गई थी, जिसे बैंकिंग कंसोर्टियम ने पारदर्शी प्रक्रिया के तहत नियुक्त किया था। यह रिपोर्ट 2020 में तैयार की गई थी और इसमें रिलायंस कम्युनिकेशंस तथा उससे जुड़ी इकाइयों को दिए गए ऋणों की विस्तृत जांच की गई थी।
यह पूरा विवाद इसी फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट पर आधारित है, जिसके आधार पर बैंकों ने खातों को फ्रॉड श्रेणी में रखने की कार्रवाई शुरू की। दिसंबर 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस कार्रवाई पर अस्थायी रोक लगाई थी, लेकिन बाद में खंडपीठ ने उस आदेश को पलट दिया। खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ ने 2024 के आरबीआई दिशानिर्देशों को गलत तरीके से पूर्वव्यापी रूप से लागू किया था।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि फॉरेंसिक ऑडिट 2016 के नियामकीय ढांचे के तहत कराया गया था और बाद में आए नियमों के आधार पर उसे अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। इसके बाद बैंकों को आगे की कार्रवाई की अनुमति मिल गई।
अनिल अंबानी ने हाईकोर्ट में दीवानी मुकदमे दायर कर फॉरेंसिक रिपोर्ट और फ्रॉड वर्गीकरण को गैरकानूनी बताते हुए उन्हें रद्द करने और हर्जाने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय तक सभी कानूनी विकल्प खुले रहेंगे।
इस फैसले के बाद बैंकिंग सेक्टर और कॉर्पोरेट जगत में इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय बैंकिंग नियामक ढांचे और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा को लेकर भविष्य में महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है।
फिलहाल मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में विचाराधीन रहेगा, जहां आगे विस्तृत सुनवाई की जाएगी। सभी पक्ष अब आगामी कानूनी लड़ाई की तैयारी में जुट गए हैं और इस हाई-प्रोफाइल कॉर्पोरेट विवाद पर बाजार और वित्तीय जगत की नजरें टिकी हुई हैं
