देहरादून: किसी व्यक्ति को बिना पुष्ट चिकित्सकीय जांच के HIV पॉजिटिव बताना गंभीर लापरवाही है। उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने AIIMS ऋषिकेश को एक मरीज के मेडिकल रिकॉर्ड में कथित तौर पर HIV पॉजिटिव दर्ज करने के मामले में ₹60 हजार मुआवजा देने के जिला आयोग के आदेश को बरकरार रखा है। आयोग ने AIIMS ऋषिकेश की अपील खारिज कर दी।
आयोग के 17 अगस्त के आदेश में ₹50 हजार मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए तथा ₹10 हजार मुकदमे के खर्च के रूप में देने का निर्देश शामिल है। आयोग की अध्यक्ष कुमकुम रानी और सदस्य सीएम सिंह ने कहा कि HIV अत्यंत संवेदनशील चिकित्सकीय स्थिति है और बिना पुष्टि के किया गया निदान मरीज के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
मेडिकल रिकॉर्ड में बार-बार लिखा गया HIV पॉजिटिव
मामला जुलाई 2014 का है। मरीज को किसी अन्य चिकित्सा संस्थान से रेफर किए जाने के बाद AIIMS ऋषिकेश में भर्ती कराया गया था। उपचार के दौरान मरीज के मेडिकल रिकॉर्ड में कथित तौर पर बार-बार HIV पॉजिटिव दर्ज किया गया। यह जानकारी डिस्चार्ज समरी में भी दर्ज थी।
बाद में मरीज ने देहरादून स्थित श्री गुरु राम राय इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंसेज और श्री महंत इंदिरेश अस्पताल में जांच कराई। दोनों संस्थानों की रिपोर्ट में मरीज को HIV निगेटिव बताया गया। इन जांच रिपोर्टों को उपभोक्ता आयोग के समक्ष भी प्रस्तुत किया गया।
मरीज ने आरोप लगाया कि AIIMS के रिकॉर्ड में HIV पॉजिटिव दर्ज होने से उसे मानसिक परेशानी और सामाजिक स्तर पर गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ा।
AIIMS ने कहा- HIV जांच नहीं की थी
AIIMS ऋषिकेश की ओर से आयोग के समक्ष बचाव में कहा गया कि उस समय संस्थान में Integrated Counselling and Testing Centre (ICTC) उपलब्ध नहीं था। संस्थान का तर्क था कि उसने मरीज का HIV टेस्ट नहीं किया और न ही आधिकारिक रूप से उसे HIV पॉजिटिव घोषित किया।
हालांकि, राज्य उपभोक्ता आयोग ने AIIMS के इस दावे को उसके अपने मेडिकल रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता पाया। आयोग ने कहा कि डिस्चार्ज समरी और उपचार से संबंधित रिकॉर्ड में मरीज को बार-बार HIV पॉजिटिव बताया गया, लेकिन संस्थान यह प्रमाणित नहीं कर सका कि यह निष्कर्ष किसी वैध और पुष्ट जांच के आधार पर दर्ज किया गया था।
बिना जांच HIV पॉजिटिव दर्ज करना गंभीर लापरवाही
आयोग ने कहा कि किसी व्यक्ति को पर्याप्त चिकित्सकीय साक्ष्य के बिना आधिकारिक मेडिकल रिकॉर्ड में HIV पॉजिटिव दर्ज करना गंभीर लापरवाही की श्रेणी में आता है। आयोग के मुताबिक, HIV का निदान अत्यंत सावधानी और निर्धारित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन करते हुए किया जाना चाहिए।
आयोग ने यह भी माना कि इस तरह की गलत जानकारी मरीज को केवल मानसिक पीड़ा ही नहीं पहुंचा सकती, बल्कि भावनात्मक तनाव और सामाजिक कलंक का कारण भी बन सकती है। इसके साथ ही ऐसी गलती से मरीजों का चिकित्सा संस्थानों पर भरोसा भी प्रभावित हो सकता है।
2019 के जिला आयोग के आदेश को चुनौती दी थी
इस मामले में हरिद्वार जिला उपभोक्ता आयोग ने वर्ष 2019 में AIIMS ऋषिकेश को मरीज को मुआवजा देने का आदेश दिया था। जिला आयोग के आदेश में मेडिकल रिकॉर्ड में बिना पर्याप्त आधार HIV पॉजिटिव दर्ज किए जाने को गंभीर मामला माना गया था।
AIIMS ऋषिकेश ने इस आदेश को राज्य उपभोक्ता आयोग के समक्ष चुनौती दी। सुनवाई के दौरान संस्थान की ओर से यह दलील दी गई कि उसने HIV जांच नहीं की थी और मरीज को आधिकारिक तौर पर HIV पॉजिटिव घोषित नहीं किया गया था।
राज्य आयोग ने उपलब्ध रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद जिला आयोग के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया। इसके बाद AIIMS की अपील खारिज कर दी गई और मरीज को दिए गए ₹60 हजार के मुआवजे का आदेश बरकरार रखा गया।
संवेदनशील मेडिकल जानकारी में सावधानी जरूरी
आयोग के फैसले ने मेडिकल रिकॉर्ड में संवेदनशील स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दर्ज करने में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत को रेखांकित किया है। HIV जैसी स्थिति से जुड़ी गलत जानकारी मरीज के इलाज, मानसिक स्थिति और सामाजिक जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
फिलहाल आयोग के आदेश के बाद AIIMS ऋषिकेश को जिला आयोग के निर्देश के अनुसार मरीज को कुल ₹60 हजार का भुगतान करना होगा। मामले में यह भी स्पष्ट हुआ कि केवल मेडिकल रिकॉर्ड में किसी गंभीर बीमारी का उल्लेख पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे निदान के पीछे विश्वसनीय चिकित्सकीय आधार और निर्धारित जांच प्रक्रिया का होना जरूरी है।
