नई दिल्ली। ऑनलाइन खरीदारी की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से लोगों की पसंदीदा सलाहकार बनती जा रही है, लेकिन अब यही तकनीक साइबर ठगों के लिए भी नया हथियार बनती दिखाई दे रही है। हाल के मामलों में सामने आया है कि कुछ उपभोक्ता AI चैटबॉट्स द्वारा सुझाई गई वेबसाइटों पर भरोसा कर खरीदारी करने पहुंचे, लेकिन बाद में पता चला कि वे साइटें असली ब्रांडों की नकल कर बनाई गई फर्जी वेबसाइटें थीं। नतीजतन ग्राहकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा और कई मामलों में उनके बैंकिंग व भुगतान संबंधी विवरण भी साइबर अपराधियों के हाथ लग गए।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह नया खतरा पारंपरिक फिशिंग और फर्जी वेबसाइट घोटालों का विकसित रूप है। अंतर केवल इतना है कि पहले उपभोक्ता सर्च इंजन या सोशल मीडिया विज्ञापनों के जरिए ऐसी साइटों तक पहुंचते थे, जबकि अब कुछ मामलों में AI आधारित टूल्स के उत्तरों में भी संदिग्ध वेबसाइटों के लिंक दिखाई देने लगे हैं।
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साइबर सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े विश्लेषकों का कहना है कि अपराधी लोकप्रिय ब्रांडों जैसी दिखने वाली वेबसाइटें तैयार करते हैं। इन साइटों का डिजाइन, उत्पाद सूची, लोगो और डिस्काउंट ऑफर इतने वास्तविक लगते हैं कि सामान्य उपभोक्ता के लिए असली और नकली के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है। कई बार ग्राहकों को भारी छूट का लालच देकर भुगतान कराया जाता है, लेकिन सामान कभी भेजा ही नहीं जाता।
मामले की जांच कर रहे विशेषज्ञों ने यह भी आशंका जताई है कि कुछ साइबर गिरोह AI मॉडल्स तक पहुंचने वाली सार्वजनिक जानकारी को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में “डेटा पॉइजनिंग” कहा जाता है, जिसमें भ्रामक या फर्जी सामग्री इंटरनेट पर बड़ी मात्रा में डाली जाती है ताकि AI सिस्टम उसे वैध सूचना समझकर अपने उत्तरों में शामिल कर लें।
ऑनलाइन सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि AI आधारित सर्च और सिफारिश प्रणालियों की लोकप्रियता बढ़ने के साथ-साथ अपराधी भी अपने तौर-तरीकों को तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि किसी वेबसाइट का AI द्वारा उल्लेख किया जाना उसकी वैधता की गारंटी नहीं है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि साइबर अपराधी लगातार नई तकनीकों का दुरुपयोग करने के तरीके खोजते रहते हैं। उनके अनुसार पहले अपराधी फर्जी कॉल, सोशल इंजीनियरिंग और नकली निवेश प्लेटफॉर्म का सहारा लेते थे, जबकि अब AI आधारित डिजिटल इकोसिस्टम भी उनके निशाने पर है। प्रो. सिंह ने कहा कि उपभोक्ताओं को किसी भी वेबसाइट पर भुगतान करने से पहले उसके डोमेन, संपर्क विवरण, ग्राहक समीक्षा और आधिकारिक स्रोतों से सत्यापन अवश्य करना चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि अत्यधिक छूट, केवल बैंक ट्रांसफर से भुगतान की मांग, संदिग्ध डोमेन नाम और सीमित संपर्क जानकारी जैसी बातें संभावित धोखाधड़ी के संकेत हो सकती हैं। उनके अनुसार डिजिटल साक्षरता और सावधानी ही ऐसे अपराधों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ऑनलाइन खरीदारी करते समय उपभोक्ता सीधे ब्रांड की आधिकारिक वेबसाइट या अधिकृत मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग करें। यदि किसी साइट का पता असामान्य लगे या उसके नाम में अतिरिक्त शब्द जुड़े हों, तो अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। साथ ही भुगतान से पहले वेबसाइट के सुरक्षा प्रमाणपत्र और ग्राहक सहायता विवरण की भी जांच करना आवश्यक है।
यदि किसी व्यक्ति ने गलती से संदिग्ध वेबसाइट पर अपने बैंकिंग या कार्ड संबंधी विवरण साझा कर दिए हों, तो उसे तुरंत बैंक से संपर्क कर कार्ड ब्लॉक कराने, पासवर्ड बदलने और संबंधित साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी जाती है।
तकनीक विशेषज्ञों का कहना है कि AI उपभोक्ताओं के लिए एक उपयोगी साधन है, लेकिन इसे अंतिम और पूर्णतः विश्वसनीय स्रोत मानना जोखिम भरा हो सकता है। डिजिटल दुनिया में बढ़ते साइबर खतरों के बीच सतर्कता, तथ्य-जांच और आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि ही सुरक्षित ऑनलाइन खरीदारी की सबसे महत्वपूर्ण शर्त बनी हुई है।
