बुंदूकटरा निवासी विनोद वीर सिंह को 3 दिन कैद कर ₹12 लाख RTGS कराए।

‘डिजिटल अरेस्ट’ का खौफ: आगरा में रिटायर पेशकार से लाखों ठगे, तीन दिन कमरे में कैद रखकर कराई RTGS

Team The420
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शहर में साइबर अपराधियों ने एक बार फिर ‘डिजिटल अरेस्ट’ की पटकथा रचकर बुजुर्ग को निशाना बनाया है। सदर क्षेत्र के बुंदूकटरा निवासी 68 वर्षीय रिटायर कोर्ट पेशकार विनोद वीर सिंह से ठगों ने ₹12 लाख की रकम हड़प ली। आरोप है कि तीन दिनों तक उन्हें घर के एक कमरे में ही रहने को मजबूर किया गया, किसी से बात करने की मनाही रही और लगातार वीडियो कॉल के जरिये मानसिक दबाव बनाया गया। रकम आरटीजीएस कराने के बाद जब बेटे से बातचीत हुई, तब पूरे घटनाक्रम का खुलासा हुआ।

पीड़ित ने साइबर क्राइम थाने में मुकदमा दर्ज कराया है। तहरीर के मुताबिक 17 फरवरी को उनके मोबाइल पर वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को आतंकवाद निरोधी दस्ते से जुड़ा अधिकारी बताया। उसने कहा कि पुलवामा हमले से जुड़े एक आतंकी को पकड़ा गया है, जिसके पास से एक एटीएम कार्ड मिला है। उस खाते से ₹536 करोड़ का लेन-देन हुआ है और वह बैंक खाता उनके आधार कार्ड से लिंक बताया गया। यह भी कहा गया कि पूछताछ में आतंकी ने स्वीकार किया है कि उसने रुपये देकर उनका आधार कार्ड लिया था।

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यह सुनते ही बुजुर्ग घबरा गए। कॉल करने वाले ने मामले को “देश की सुरक्षा” से जुड़ा बताते हुए उन्हें तत्काल पुणे पहुंचकर बयान देने की बात कही। जब उन्होंने असमर्थता जताई तो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बयान दर्ज कराने का प्रस्ताव रखा गया। साथ ही सख्त हिदायत दी गई कि जांच पूरी होने तक वे किसी से बात नहीं करेंगे, किसी का फोन नहीं उठाएंगे और घर से बाहर नहीं निकलेंगे। उन्हें यह भी कहा गया कि उनका मोबाइल सर्विलांस पर है और एक गलती उनके परिवार के लिए खतरा बन सकती है।

डर और असमंजस में फंसे पीड़ित तीन दिन तक कॉल पर पूछताछ झेलते रहे। पहले खुद को प्रदीप सामंत बताने वाले व्यक्ति ने उन्हें धमकाया। बाद में आगे की जांच के नाम पर राजेश मिश्रा नामक शख्स कॉल पर जुड़ गया। दोनों ने मिलकर ऐसा माहौल बनाया मानो वे किसी बड़े राष्ट्रीय सुरक्षा प्रकरण में आरोपी हों। इसी दौरान उनसे एक बैंक खाते में ₹12 लाख आरटीजीएस कराने को कहा गया, ताकि “खाते की सत्यापन प्रक्रिया” पूरी हो सके।

पीड़ित के अनुसार जिस दिन वे रकम ट्रांसफर करने बैंक गए, आरोपित लगातार फोन पर बने रहे। उस दिन करीब 30 बार कॉल कर उन पर दबाव बनाया गया। बैंक से लौटने के बाद भी कॉल जारी रहे और उन्हें कमरे में ही रहने की हिदायत दी जाती रही। तीन दिन बाद जब बेटे ने किसी तरह उनसे बातचीत की, तब मामला खुला। परिवार ने तुरंत साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई।

घटना को छह दिन बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि कॉल किस स्थान से आए थे और रकम किस खाते में ट्रांसफर हुई। जांच में सर्विलांस और बैंकिंग ट्रेल खंगाले जा रहे हैं। प्रारंभिक पड़ताल में आशंका है कि रकम फर्जी खातों के जरिये आगे ट्रांसफर की गई होगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर ठग लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा, मनी लॉन्ड्रिंग या कोर्ट केस का डर दिखाकर मानसिक रूप से अलग-थलग कर देते हैं। लगातार कॉल, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और कानूनी शब्दावली का इस्तेमाल कर भरोसा पैदा किया जाता है। आगरा की यह घटना बताती है कि जागरूकता की कमी और डर का माहौल साइबर अपराधियों के लिए सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।

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