नई दिल्ली। भारत में डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार के साथ साइबर ठगी के तरीकों में भी लगातार बदलाव हो रहा है। स्पैम कॉल और फिशिंग संदेशों से आगे बढ़कर जालसाज अब पहचान की नकल, फर्जी बैंकिंग अनुरोध, दुर्भावनापूर्ण लिंक, निवेश के नाम पर ठगी और ओटीपी से जुड़े वित्तीय धोखाधड़ी के तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में दूरसंचार नेटवर्क को डिजिटल सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर बढ़ रहा है।
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों में भारतीयों को साइबर ठगी के कारण ₹52,976 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में भी साइबर अपराध के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि कुल अपराध के स्तर में गिरावट का रुझान रहा है।
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बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य सेवाओं, खरीदारी और सरकारी सेवाओं में इंटरनेट और मोबाइल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के कारण दूरसंचार नेटवर्क अब केवल संचार का माध्यम नहीं रह गया है। इन्हीं नेटवर्क के जरिए संदिग्ध कॉल, संदेश और लिंक उपयोगकर्ताओं तक पहुंचते हैं, इसलिए नेटवर्क स्तर पर खतरे की पहचान को डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
एआई आधारित नेटवर्क सुरक्षा का विस्तार
एयरटेल ने 2024 में नेटवर्क आधारित एआई संचालित स्पैम पहचान प्रणाली शुरू की थी। कंपनी के अनुसार, यह दूरसंचार क्षेत्र में नेटवर्क स्तर पर संदिग्ध कॉल और एसएमएस की पहचान कर ग्राहकों को सचेत करने वाली शुरुआती प्रणालियों में से एक थी।
कंपनी ने पिछले दो वर्षों में इस पहल का विस्तार अपने ‘सेफ नेटवर्क’ कार्यक्रम के तहत किया है। इसका उद्देश्य मोबाइल नेटवर्क पर ही संभावित खतरों की पहचान करना है, ताकि उपयोगकर्ताओं को अलग से कोई ऐप डाउनलोड करने या प्रत्येक संदिग्ध गतिविधि की मैनुअल रिपोर्ट करने की जरूरत न पड़े।
एयरटेल के अनुसार, उसकी प्रणाली अब तक 98.4 अरब स्पैम कॉल को चिह्नित कर चुकी है। कंपनी का कहना है कि यह आंकड़ा मोबाइल उपयोगकर्ताओं तक पहुंचने वाले अवांछित और संभावित रूप से धोखाधड़ी वाले संचार के बड़े पैमाने को दर्शाता है।
ओटीपी और दुर्भावनापूर्ण लिंक पर भी नजर
कंपनी के मुताबिक, ‘सेफ नेटवर्क’ अब केवल पारंपरिक स्पैम पहचान तक सीमित नहीं है। इसमें ओटीपी से जुड़ी वित्तीय ठगी से सुरक्षा, दुर्भावनापूर्ण लिंक की पहचान और संदिग्ध डिजिटल गतिविधियों से जुड़े अन्य सुरक्षा उपाय भी शामिल किए गए हैं।
नेटवर्क स्तर पर संदिग्ध गतिविधियों की पहचान का उद्देश्य संभावित खतरे को उपयोगकर्ता तक पहुंचने या उसके वित्तीय अथवा व्यक्तिगत नुकसान का कारण बनने से पहले चिह्नित करना है। कंपनी के अनुसार, जालसाज डिजिटल संचार माध्यमों का लगातार नए तरीकों से इस्तेमाल कर रहे हैं, ऐसे में नेटवर्क स्तर पर सुरक्षा उपाय मौजूदा डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था के अतिरिक्त स्तर के रूप में काम कर सकते हैं।
डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ साइबर ठगी से निपटने में बैंक, दूरसंचार कंपनियां, डिजिटल मंच और सरकारी एजेंसियां अलग-अलग स्तरों पर सुरक्षा उपायों को मजबूत कर रही हैं। ऐसे में नेटवर्क आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों के जरिए संदिग्ध संचार की शुरुआती पहचान पर बढ़ता जोर डिजिटल धोखाधड़ी को रोकने की व्यापक रणनीति का हिस्सा बनता जा रहा है।
