एटा: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों को प्राकृतिक आपदा से होने वाले फसल नुकसान की आर्थिक भरपाई का भरोसा दिया जाता है, लेकिन एटा जिले के वर्ष 2025 के खरीफ सीजन के आंकड़े बीमा कवरेज और मुआवजे के बीच बड़ा अंतर दिखा रहे हैं। जिले में 49,131 किसानों ने 9,313 हेक्टेयर खरीफ फसल का बीमा कराया था। किसानों के साथ केंद्र और राज्य सरकार की ओर से मिलाकर बीमा कंपनी को ₹2,86,20,493 का प्रीमियम दिया गया। इसके बावजूद दावों के निस्तारण के बाद सिर्फ 6,561 किसानों को कुल ₹1,60,23,000 का मुआवजा मिला।
उप कृषि निदेशक कार्यालय और संबंधित बीमा कंपनी यूनिवर्सल शैम्पो जनरल इंश्योरेंस की रिपोर्ट के अनुसार, बीमा कराने वाले किसानों में 48,846 ऋणी और 285 गैर-ऋणी किसान शामिल थे। इन किसानों ने अपनी फसल को बीमा सुरक्षा में शामिल कराने के लिए ₹1,42,95,915 का प्रीमियम जमा किया था। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकार ने भी अपने हिस्से की राशि बीमा कंपनी को दी।
केंद्र और राज्य ने भी दिया प्रीमियम का हिस्सा
फसल बीमा योजना के तहत किसानों के प्रीमियम का पूरा बोझ किसानों पर नहीं होता। निर्धारित व्यवस्था के अनुसार केंद्र और राज्य सरकार भी प्रीमियम में अपना हिस्सा देती हैं। एटा में केंद्र सरकार की ओर से ₹71,62,289 और इतनी ही राशि राज्य सरकार की ओर से जमा कराई गई।
इस तरह किसानों के ₹1.42 करोड़ से अधिक के योगदान के साथ केंद्र और राज्य के हिस्से को जोड़ने पर बीमा कंपनी को कुल ₹2.86 करोड़ से अधिक का प्रीमियम प्राप्त हुआ। बीमा का उद्देश्य यह था कि निर्धारित जोखिम के कारण फसल को नुकसान होने पर पात्र किसानों को आर्थिक क्षतिपूर्ति दी जा सके।
49 हजार से ज्यादा किसानों ने कराया था बीमा
2025 के खरीफ सीजन में जिले में बड़ी संख्या में किसानों ने अपनी फसलों को बीमा कवरेज के दायरे में लाया। कुल 49,131 किसानों की 9,313 हेक्टेयर फसल बीमित की गई। किसानों के लिए यह सुरक्षा इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि खरीफ सीजन में बारिश, सूखा, कीट प्रकोप और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण फसल को नुकसान होने की आशंका बनी रहती है।
बीमा कराने के बाद किसानों को उम्मीद थी कि यदि निर्धारित जोखिमों के कारण उनकी फसल प्रभावित होती है तो नुकसान का आकलन कर उन्हें नियमानुसार मुआवजा मिलेगा। हालांकि, दावों के अंतिम निस्तारण के आंकड़े इस उम्मीद से काफी अलग नजर आए।
सिर्फ 6,561 किसानों को मिला मुआवजा
रिपोर्ट के अनुसार, कुल 49,131 बीमित किसानों में से केवल 6,561 किसानों के दावे मुआवजे के लिए पात्र पाए गए। इन किसानों को कुल ₹1,60,23,000 की क्षतिपूर्ति दी गई।
इस हिसाब से करीब 42,570 बीमित किसान ऐसे रहे, जिन्हें उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मुआवजा नहीं मिला। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन किसानों के दावों का निस्तारण किस आधार पर किया गया और कितने दावे किन कारणों से अस्वीकार किए गए।
प्रीमियम और मुआवजे के बीच ₹1.26 करोड़ का अंतर
किसानों, केंद्र और राज्य सरकार की ओर से जमा कुल ₹2,86,20,493 के मुकाबले ₹1,60,23,000 का मुआवजा वितरित किया गया। दोनों राशियों के बीच करीब ₹1.26 करोड़ का अंतर है।
हालांकि, इस अंतर को सीधे बीमा कंपनी का मुनाफा मानना सही नहीं होगा। बीमा कारोबार में प्रशासनिक खर्च, पुनर्बीमा, दावों के आकलन और अन्य वित्तीय देनदारियां भी शामिल होती हैं। इसलिए केवल प्रीमियम और भुगतान की रकम के आधार पर कंपनी के शुद्ध लाभ का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
फिर भी इतने बड़े अंतर के कारण दावों के निस्तारण की प्रक्रिया को लेकर सवाल जरूर उठ रहे हैं। खासकर उन किसानों के लिए यह जानकारी महत्वपूर्ण है, जिनकी फसल को नुकसान हुआ लेकिन उन्हें बीमा क्षतिपूर्ति नहीं मिली।
खारिज दावों की वजह सामने आना जरूरी
किसानों के हित में यह स्पष्ट किया जाना महत्वपूर्ण है कि शेष दावों को किन आधारों पर खारिज किया गया। क्या फसल नुकसान निर्धारित सीमा के अनुरूप नहीं पाया गया, क्या नुकसान का आकलन बीमा की शर्तों के दायरे में नहीं आया या किसी अन्य तकनीकी कारण से दावे अस्वीकार किए गए—इन सवालों का जवाब किसानों के लिए अहम है।
साथ ही, जिन किसानों के दावे खारिज हुए हैं, उनके पास आपत्ति या पुनर्विचार की क्या व्यवस्था है, इसकी जानकारी भी स्पष्ट होनी चाहिए। फसल बीमा योजना की सफलता केवल बीमित किसानों की संख्या से नहीं, बल्कि नुकसान के समय पात्र किसानों तक समय पर और पारदर्शी तरीके से मुआवजा पहुंचने से तय होती है।
एटा के ये आंकड़े बीमा कवरेज, फसल नुकसान के आकलन और दावों के निस्तारण की प्रक्रिया की समीक्षा की जरूरत जरूर दिखाते हैं। खासकर 49 हजार से अधिक बीमित किसानों में केवल 6,561 तक क्षतिपूर्ति पहुंचने के बाद अब खारिज दावों का पूरा विवरण सामने आना इस मामले की तस्वीर को और स्पष्ट कर सकता है।
