नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने 75 वर्षीय ब्रेस्ट कैंसर पीड़िता के साथ कथित “डिजिटल अरेस्ट” साइबर ठगी के मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 13 अगस्त तय की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अप्रैल में प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद जांच में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई, जबकि मामला अत्यंत गंभीर और संगठित साइबर अपराध से जुड़ा है।
मामले की सुनवाई जस्टिस गिरीश कठपालिया की पीठ ने 30 जुलाई को की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि देशभर में बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने CBI को नोडल एजेंसी के रूप में जिम्मेदारी सौंपी है। इस आधार पर याचिकाकर्ताओं ने मामले की प्रभावी और समन्वित जांच की मांग की। अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद CBI और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जांच की वर्तमान स्थिति से अवगत कराने के निर्देश दिए।
याचिका के अनुसार, 6 अप्रैल से 27 अप्रैल के बीच ठगों ने स्वयं को CBI और प्रवर्तन निदेशालय (ED) का अधिकारी बताकर 75 वर्षीय महिला को लगातार वीडियो कॉल के माध्यम से अपने नियंत्रण में रखा। आरोप है कि महिला पर मनी लॉन्ड्रिंग में संलिप्त होने का झूठा आरोप लगाया गया और कहा गया कि यदि उन्होंने अधिकारियों के निर्देशों का पालन नहीं किया तो उनके बच्चों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। लगातार मानसिक दबाव, भय और कथित सरकारी कार्रवाई की धमकियों के कारण महिला ठगों के झांसे में आ गई।
शिकायत के मुताबिक, इस कथित साइबर ठगी के दौरान महिला ने पहले ₹3 लाख आरोपियों के बताए बैंक खाते में स्थानांतरित किए। इसके बाद उन्होंने ₹4.95 लाख का ऋण लेने के लिए अपने सोने के आभूषण गिरवी रख दिए। इतना ही नहीं, ठगों के दबाव में उन्होंने वसंत कुंज स्थित अपना मकान बेचने के लिए लगभग ₹2.4 करोड़ का बिक्री समझौता भी कर लिया। याचिका में दावा किया गया है कि ठगों ने महिला की मानसिक स्थिति का लाभ उठाते हुए उन्हें आर्थिक रूप से पूरी तरह असुरक्षित बना दिया।
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याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि ठगी की पूरी योजना अत्यंत सुनियोजित तरीके से संचालित की गई। आरोप है कि ठगों ने सुशांत कुमार नामक व्यक्ति को महिला के घर भेजा, जिसने मकान से जुड़े मूल स्वामित्व दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए। इससे यह आशंका भी जताई गई कि गिरोह केवल ऑनलाइन ठगी तक सीमित नहीं था, बल्कि जमीन और संपत्ति से जुड़े दस्तावेज हासिल कर आगे भी आर्थिक अपराध को अंजाम देने की तैयारी कर रहा था।
घटना का खुलासा तब हुआ जब नीदरलैंड में रहने वाली महिला की बेटी ने वीडियो कॉल के दौरान अपनी मां की घबराई हुई स्थिति देखी। संदेह होने पर उसने अन्य परिजनों को सूचना दी, जिसके बाद पूरे मामले की जानकारी सामने आई। परिवार ने तुरंत संबंधित एजेंसियों से संपर्क किया और बाद में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद अप्रैल में प्राथमिकी दर्ज हुई, लेकिन याचिका में आरोप लगाया गया कि कई महीने बीत जाने के बावजूद जांच में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं कुश शर्मा और निहारिका तंवर ने अदालत के समक्ष दलील दी कि यह सामान्य साइबर धोखाधड़ी का मामला नहीं, बल्कि संगठित अपराध का उदाहरण है, जिसमें पीड़ित को लंबे समय तक डिजिटल माध्यम से भयभीत और नियंत्रित रखा गया। उन्होंने अदालत से स्वतंत्र और प्रभावी जांच सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट गिरोह सबसे पहले पीड़ित के मन में कानूनी कार्रवाई का भय पैदा करते हैं और फिर उसे लगातार वीडियो कॉल या अन्य माध्यमों से अलग-थलग रखकर निर्णय लेने की क्षमता कमजोर कर देते हैं। उन्होंने कहा कि CBI, ED, पुलिस या किसी भी सरकारी एजेंसी का कोई अधिकारी फोन या वीडियो कॉल पर किसी नागरिक को “डिजिटल अरेस्ट” नहीं करता और न ही जांच के नाम पर धन हस्तांतरित करने का निर्देश देता है। ऐसे किसी भी कॉल की स्थिति में तुरंत संपर्क समाप्त कर आधिकारिक माध्यमों से सत्यापन करना चाहिए तथा साइबर अपराध की सूचना तत्काल संबंधित प्राधिकरण को देनी चाहिए।
