प्रयागराज से शुरू हुई कार्रवाई में मुख्य आरोपी समेत कई लोगों से पूछताछ; अधिकृत ऑपरेटर आईडी के कथित दुरुपयोग, रिमोट एक्सेस, व्हाट्सएप चैट और डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर जांच आगे बढ़ी

आंध्र प्रदेश की ‘थल्लिकी वंदनम’ योजना में साइबर सेंध, 28 लाभार्थियों के खातों से उड़ाई सरकारी सहायता

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By Roopa
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कुरनूल: आंध्र प्रदेश सरकार की ‘थल्लिकी वंदनम’ कल्याणकारी योजना में साइबर ठगी का बड़ा मामला सामने आया है। कुरनूल जिले में साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर 28 लाभार्थियों के बैंक खातों से सरकारी वित्तीय सहायता की राशि निकाल ली। जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने सिम कार्ड जारी करने के दौरान लोगों की आधार संबंधी जानकारी, बायोमेट्रिक डेटा और बैंक खाते का विवरण हासिल कर उसका दुरुपयोग किया। पुलिस ने मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि यह भी जांच की जा रही है कि इस संगठित साइबर धोखाधड़ी में अन्य लोग भी शामिल थे या नहीं।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों की पहचान उपेंद्र और वीरा रेड्डी के रूप में हुई है। दोनों कथित तौर पर एयरटेल सिम कार्ड विक्रेता के रूप में कार्य करते थे। जांच में आरोप है कि सिम कार्ड जारी करने की प्रक्रिया के दौरान उन्होंने ग्राहकों से आधार नंबर, अंगुलियों के निशान (फिंगरप्रिंट) और बैंक खाते से जुड़ी जानकारी प्राप्त की। बाद में इसी संवेदनशील जानकारी का इस्तेमाल कर लाभार्थियों के बैंक खातों तक अनधिकृत पहुंच बनाई गई और सरकारी योजना के तहत मिलने वाली सहायता राशि को बिना जानकारी के अन्य खातों में स्थानांतरित कर दिया गया।

घटना का खुलासा तब हुआ जब कई लाभार्थियों ने अपने खातों में योजना की राशि नहीं पहुंचने की शिकायत की। बैंक विवरण की जांच में पता चला कि सरकारी सहायता पहले ही खातों से निकाल ली गई थी। इसके बाद पीड़ितों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर कुरनूल के वन टाउन थाने में मामला दर्ज किया गया और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इस पूरे साइबर फ्रॉड के पीछे कोई बड़ा संगठित गिरोह सक्रिय था। पुलिस आरोपियों के मोबाइल फोन, बैंक खातों, डिजिटल लेनदेन, कॉल रिकॉर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि यदि अन्य सहयोगियों की भूमिका सामने आती है तो मामले में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।

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प्रारंभिक जांच से संकेत मिले हैं कि लाभार्थियों की पहचान और बायोमेट्रिक जानकारी का इस्तेमाल कर बैंकिंग सत्यापन प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि सरकारी सहायता की राशि किन खातों में स्थानांतरित की गई और धन को आगे किस प्रकार निकाला या ट्रांसफर किया गया। जांच पूरी होने के बाद साइबर नेटवर्क की पूरी कार्यप्रणाली सामने आने की संभावना है।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि आधार, बायोमेट्रिक और बैंकिंग जानकारी अत्यंत संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा है। यदि यह जानकारी गलत हाथों में पहुंच जाती है तो इसका इस्तेमाल सरकारी योजनाओं, बैंक खातों और डिजिटल पहचान से जुड़ी धोखाधड़ी में किया जा सकता है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि सिम कार्ड बनवाते समय या किसी भी सेवा के लिए आधार, फिंगरप्रिंट, ओटीपी, यूपीआई पिन अथवा बैंकिंग विवरण केवल अधिकृत एजेंसियों को ही उपलब्ध कराएं और किसी भी अनधिकृत व्यक्ति के साथ ऐसी जानकारी साझा करने से बचें।

पुलिस ने लोगों से केवल अधिकृत दूरसंचार केंद्रों से ही सिम कार्ड लेने और सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन केवल सरकारी कार्यालयों, वार्ड या ग्राम सचिवालय अथवा आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से करने की सलाह दी है। अधिकारियों ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को सरकारी सहायता, बैंक खाते या डिजिटल भुगतान से जुड़ी कोई संदिग्ध गतिविधि दिखाई दे तो तुरंत संबंधित बैंक को सूचित करें और 1930 साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराएं, ताकि समय रहते राशि को सुरक्षित किया जा सके।

इस घटना ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि साइबर अपराधी अब केवल ऑनलाइन बैंकिंग या डिजिटल भुगतान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को भी निशाना बना रहे हैं। ऐसे में व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा, डिजिटल सतर्कता और सरकारी सेवाओं का उपयोग केवल अधिकृत माध्यमों से करना ही इस तरह की धोखाधड़ी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय माना जा रहा है।

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