केरल के कोच्चि में करोड़ों रुपये के कथित अंग प्रत्यारोपण रैकेट के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अपनी कार्रवाई को काफी तेज कर दिया है। जांच एजेंसी ने राज्य के प्रमुख निजी मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पतालों की आंतरिक ट्रांसप्लांट मूल्यांकन समितियों के कई वरिष्ठ डॉक्टरों को पूछताछ के लिए तलब किया है। इस बड़ी कार्रवाई से चिकित्सा क्षेत्र में हलचल मच गई है क्योंकि अब सीधे उन संस्थागत समितियों की भूमिका की जांच हो रही है जो कानूनी और नैतिक तौर पर इन संवेदनशील मामलों को मंजूरी देती हैं।
अस्पतालों की आंतरिक समितियों की भूमिका और वित्तीय लेनदेन की गहरी जांच
ED की कोच्चि जोनल इकाई मुख्य रूप से अस्पतालों की आंतरिक ट्रांसप्लांट मूल्यांकन समितियों के कामकाज की पड़ताल कर रही है। ये समितियां किसी भी अंग प्रत्यारोपण के चिकित्सीय, नैतिक और कानूनी पहलुओं की बारीकी से समीक्षा करने के बाद ही उसे अंतिम मंजूरी के लिए सरकारी जिला प्राधिकरण के पास भेजती हैं। जांचकर्ता अब यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि क्या इन समितियों के डॉक्टरों ने संदिग्ध मामलों को जानबूझकर नजरअंदाज किया या फिर भारी-भरकम वित्तीय लाभ के बदले मंजूरी की प्रक्रिया को अवैध रूप से तेज किया। एजेंसी ने पहले ही कई नामी अस्पतालों के प्रबंध निदेशकों और प्रशासनिक अधिकारियों से लंबी पूछताछ की है। अब डॉक्टरों के निजी बैंक खातों और अस्पताल के वित्तीय रिकॉर्ड्स की फॉरेंसिक ऑडिट की जा रही है ताकि अवैध कमीशन या किकबैक के सटीक सुराग जुटाए जा सकें।
फर्जी दस्तावेजों और वित्तीय प्रलोभन के जरिए फैला था पूरा रैकेट
यह पूरी मनी लॉन्ड्रिंग जांच केरल पुलिस द्वारा दर्ज की गई कई प्राथमिकियों पर आधारित है। पुलिस की जांच में कासरगोड निवासी मोहम्मद नजीब कल्लात्रा को इस पूरे अंतर-जिला मानव अंग तस्करी नेटवर्क का मुख्य सरगना बताया गया है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों का आरोप है कि अंग प्रत्यारोपण से जुड़े सख्त कानूनी प्रावधानों से बचने के लिए इस गिरोह ने डॉक्टरों की नकली मुहरों, फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्रों, अस्पतालों के जाली लेटरहेड और पुलिस के नकली अनापत्ति प्रमाणपत्रों (NOC) का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। इन जाली कागजातों की मदद से पूरी तरह से अनजान दाताओं और मरीजों के बीच झूठे पारिवारिक या मानवीय संबंध दिखाए जाते थे ताकि कानूनी मंजूरी आसानी से मिल सके।
वित्तीय प्रलोभनों के इस काले खेल को समझाते हुए जांच अधिकारियों ने बताया कि यह गिरोह आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि वाले लोगों को ₹5 लाख से ₹10 लाख का प्रलोभन देकर किडनी दान करने के लिए राजी करता था। इसके विपरीत अंग प्राप्त करने वाले गंभीर मरीजों से ₹20 लाख से ₹25 लाख तक की भारी-भरकम राशि वसूली जाती थी। दोनों राशियों के बीच का यह एक बहुत बड़ा हिस्सा बिचौलियों और रैकेट के संचालकों की जेब में चला जाता था। पिछले महीने एर्नाकुलम, तिरुवनंतपुरम, कोल्लम और कोट्टायम के अस्पतालों से जब्त किए गए डोनर रजिस्टरों और वित्तीय रिकॉर्ड्स से इस अवैध मुनाफे का पूरा सच सामने आ रहा है।
संस्थागत प्रणालियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य
फ्यूचर क्राइम रिसर्च फाउंडेशन (FCRF) के तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, अवैध अंग प्रत्यारोपण नेटवर्क हमेशा प्रशासनिक कमियों और कागजी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग का फायदा उठाते हैं। इस तरह के गंभीर अपराधों को पूरी तरह रोकने के लिए अस्पतालों की प्रत्यारोपण स्वीकृति प्रणालियों का एक स्वतंत्र ऑडिट होना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही सभी प्रकार के मेडिकल और प्रशासनिक दस्तावेजों का डिजिटल सत्यापन होना चाहिए। वित्तीय लेनदेन पर कड़ी निगरानी रखने और इस प्रक्रिया से जुड़े सभी डॉक्टरों तथा अधिकारियों की सीधी जवाबदेही तय करने से ही चिकित्सा प्रणाली की पारदर्शिता को दोबारा बहाल किया जा सकता है।
