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लोन चुकाने के बाद भी 16 महीने तक रोके संपत्ति के मूल दस्तावेज, उपभोक्ता आयोग ने बैंक पर ₹2.5 लाख का जुर्माना लगाया

Team The420
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केरल राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ऋण खाते बंद होने के बाद भी बिना वैध कारण किसी ग्राहक के संपत्ति संबंधी मूल दस्तावेज अपने पास रखना सेवा में कमी (Deficiency in Service) है। आयोग ने इस मामले में फेडरल बैंक की पुडुनागरम शाखा के प्रबंधक को शिकायतकर्ता महिला को ₹2.5 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया है।

आयोग के समक्ष दायर शिकायत में महिला ने आरोप लगाया कि उसने वर्ष 2016 में बैंक से ‘प्रत्याशा’ योजना के तहत ऋण लिया था, जिसके लिए उसने अपनी संपत्ति के मूल टाइटल डीड्स बैंक में जमा कराए थे। यह ऋण वर्ष 2021 में पूरी तरह चुका दिया गया। इसके बाद वर्ष 2019 में उसने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत एक अन्य ऋण लिया, जिसमें पहले से जमा दस्तावेजों को ही सुरक्षा के रूप में उपयोग किया गया।

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महिला का कहना था कि बाद में उसे जानकारी मिली कि ₹10 लाख से कम के PMEGP ऋण के लिए संपत्ति गिरवी रखना अनिवार्य नहीं था। उसने आरोप लगाया कि बैंक अधिकारियों ने उसे बताया कि यदि वह दस्तावेज वापस लेती है तो उसे योजना की सब्सिडी नहीं मिलेगी। उसने यह भी कहा कि मार्च 2023 में संबंधित ऋण खाता बंद होने के बावजूद बैंक ने लगभग 16 महीने तक उसके मूल दस्तावेज वापस नहीं किए।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उसे अपनी बेटी के विवाह सहित पारिवारिक आवश्यकताओं के लिए इन दस्तावेजों की जरूरत थी, लेकिन दस्तावेज नहीं मिलने के कारण उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बैंक से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर उसने बैंक के मुख्यालय और बाद में प्रधानमंत्री शिकायत पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद बैंक ने स्वीकार किया कि PMEGP ऋण पर कोई संपत्ति गिरवी नहीं थी और अंततः अगस्त 2024 में दस्तावेज लौटा दिए गए।

मामले की सुनवाई करते हुए आयोग ने कहा कि 22 मार्च 2023 को ऋण खाता बंद होने के बाद भी लगभग एक वर्ष चार महीने तक दस्तावेज रोके रखने का बैंक कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं कर सका। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि जब दस्तावेज रोकने का कोई वैध स्पष्टीकरण नहीं दिया गया, तो इसे मनमाना और अवैध माना जाएगा।

हालांकि आयोग ने महिला के उन दावों को स्वीकार नहीं किया जिनमें उसने संपत्ति कम कीमत पर बेचने या बेटी के विवाह प्रस्ताव प्रभावित होने से आर्थिक नुकसान होने की बात कही थी। आयोग ने कहा कि इन दावों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि ऋण खाता बंद होने तक बैंक द्वारा दस्तावेज अपने पास रखना कानूनी था।

आयोग ने शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बैंक की ओर से सेवा में कमी मानी और शाखा प्रबंधक को 45 दिनों के भीतर ₹2 लाख मुआवजा तथा ₹50,000 मुकदमे का खर्च अदा करने का निर्देश दिया।

दूसरी ओर, बैंक ने अपने बचाव में कहा कि महिला ने विभिन्न योजनाओं के तहत ऋण लिया था और दस्तावेज उसकी स्वेच्छा से सुरक्षा के रूप में जमा किए गए थे। बैंक ने किसी भी प्रकार की लापरवाही या सेवा में कमी से इनकार करते हुए कहा कि दस्तावेज जुलाई और अगस्त 2024 में वापस कर दिए गए थे तथा शिकायत केवल प्रतिशोध की भावना से दायर की गई है। बैंक ने यह भी दावा किया कि वास्तविक विवाद खाते में न्यूनतम शेष राशि नहीं रखने पर काटे गए शुल्क को लेकर था।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि ऋण का पूरा भुगतान होने और कानूनी आवश्यकता समाप्त होने के बाद बैंक किसी ग्राहक के संपत्ति संबंधी मूल दस्तावेज अनावश्यक रूप से अपने पास नहीं रख सकते। ऐसा करना उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत सेवा में कमी माना जा सकता है और इसके लिए बैंक को मुआवजा देना पड़ सकता है।

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