राजस्थान हाईकोर्ट ने अलवर वन मंडल की राजगढ़ रेंज में पौधारोपण और मृदा संरक्षण कार्यों से जुड़े ₹17.5 करोड़ के कथित घोटाले पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।

₹17.5 करोड़ के कथित पौधारोपण घोटाले पर हाईकोर्ट सख्त: राजस्थान सरकार से चार सप्ताह में जवाब तलब, सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर नोटिस

Team The420
4 Min Read

राजस्थान हाईकोर्ट ने अलवर वन मंडल की राजगढ़ रेंज में पौधारोपण कार्यों से जुड़े लगभग ₹17.5 करोड़ के कथित वित्तीय घोटाले के मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि पौधारोपण और मृदा संरक्षण कार्यों के नाम पर बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं की गईं, सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ और प्राकृतिक वन क्षेत्र को भी गंभीर नुकसान पहुंचा। याचिका में पूरे मामले की न्यायालय की निगरानी में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग की गई है।

उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एक जुलाई को पारित आदेश में राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा। जनहित याचिका जयपुर स्थित एक गैर-सरकारी संस्था ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की है। याचिका में वर्ष 2023-24 के दौरान लगभग 650 हेक्टेयर क्षेत्र में किए गए पौधारोपण एवं मृदा संरक्षण कार्यों को संदेह के घेरे में रखा गया है।

FCRF Launches Certified AI-Powered SOC Analyst Program to Train the Next Generation of Cyber Defence Professionals

याचिका के अनुसार ये कार्य प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA), राजस्थान फॉरेस्ट्री एंड बायोडायवर्सिटी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट, राज्य योजना तथा फ्रेंच डेवलपमेंट एजेंसी (AFD) के वित्तीय सहयोग से संचालित किए गए थे। आरोप है कि परियोजना के दौरान भारी मशीनों से कराए गए कार्यों को कागजों में श्रम आधारित कार्य दिखाकर भुगतान लिया गया और रिकॉर्ड में हेरफेर की गई।

याचिका में दावा किया गया है कि मापन पुस्तिकाओं (Measurement Books) में कथित रूप से गलत प्रविष्टियां की गईं तथा सात ग्राम वन संरक्षण एवं प्रबंधन समितियों (VFPMC) के पदाधिकारियों के हस्ताक्षरों की कथित जालसाजी कर उनके बैंक खातों से धन निकाला गया। आरोप है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से करोड़ों रुपये की अवैध निकासी की गई।

याचिका का आधार वन विभाग की आंतरिक मूल्यांकन रिपोर्टों को बनाया गया है। बताया गया है कि जब अनियमितताओं की प्रारंभिक शिकायतें सामने आईं, तब विभागीय स्तर पर मूल्यांकन कराया गया। इन रिपोर्टों में कथित रूप से ₹2 करोड़ से अधिक के प्रत्यक्ष गबन और निष्प्रभावी व्यय का उल्लेख किया गया है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2015-16 से 2024-25 के बीच सात ग्राम वन संरक्षण एवं प्रबंधन समितियों के खातों से ₹15.5 करोड़ से अधिक की कथित अवैध निकासी हुई। यदि इसे अन्य कथित वित्तीय अनियमितताओं के साथ जोड़ा जाए तो कुल राशि लगभग ₹17.5 करोड़ तक पहुंचती है।

वित्तीय गड़बड़ियों के अलावा याचिका में पर्यावरणीय क्षति का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। आरोप लगाया गया है कि पौधारोपण ऐसे स्थानों पर कराया गया जो भौगोलिक और पारिस्थितिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं थे। साथ ही भारी अर्थ-मूविंग मशीनों के इस्तेमाल से प्राकृतिक वन क्षेत्र और मिट्टी की संरचना को अपूरणीय क्षति पहुंची, जिससे परियोजना के मूल उद्देश्य पर भी प्रश्नचिह्न लग गया।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानूनों के संभावित उल्लंघन का भी गंभीर विषय होगा। इसी आधार पर स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग की गई है।

फिलहाल उच्च न्यायालय ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है। अदालत ने केवल राज्य सरकार को नोटिस जारी कर निर्धारित अवधि में जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। राज्य सरकार का पक्ष आने और आगे की सुनवाई के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि न्यायालय मामले में किस प्रकार की आगे की कार्रवाई आवश्यक समझता है। मामले की अगली सुनवाई राज्य सरकार के जवाब दाखिल होने के बाद होगी।

हमसे जुड़ें

Share This Article