मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी के संदेह में बैंक खाते फ्रीज करने की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा है कि संबंधित मजिस्ट्रेट को कानून के अनुसार सूचना दिए बिना किसी बैंक खाते को अनिश्चितकाल तक फ्रीज नहीं रखा जा सकता। अदालत ने याचिकाकर्ता का बैंक खाता डी-फ्रीज करने तथा विवादित राशि को अलग-अलग फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) में रखने के निर्देश दिए हैं। यह राशि संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के अंतिम निर्णय के बाद ही जारी की जाएगी।
यह आदेश न्यायमूर्ति सुभोध अभ्यंकर की एकलपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिका में साइबर धोखाधड़ी के संदेह के आधार पर बैंक खाते पर लगाए गए फ्रीज और लियन को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ता ने अदालत से बैंक खाते से रोक हटाने, खाते का सामान्य संचालन बहाल करने तथा अन्य उपयुक्त राहत प्रदान करने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के पूर्व निर्णय Malcolm Murayis v. State Bank of India का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान मामला भी समान परिस्थितियों वाला है और उसी सिद्धांत को यहां लागू किया जाना चाहिए।
रिकॉर्ड के अनुसार, पूर्व मामले में याचिकाकर्ता क्रिप्टो और वर्चुअल करेंसी के कारोबार से जुड़े थे। विभिन्न साइबर सेल इकाइयों की सूचना पर बैंक ने उनके खाते फ्रीज कर दिए थे। हालांकि, उन्हें किसी भी पुलिस थाने से कोई नोटिस नहीं मिला था और जांच एजेंसियों ने बैंक खाते की जब्ती के संबंध में मजिस्ट्रेट को सूचना देने की वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि पूर्व मामले में दिए गए निर्देश वर्तमान मामले पर भी समान रूप से लागू होंगे। अदालत ने बैंक को निर्देश दिया कि विवादित राशि को अलग-अलग फिक्स्ड डिपॉजिट में रखा जाए। इन एफडी को केवल तभी भुनाया जा सकेगा, जब सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट साइबर अपराध या साइबर धोखाधड़ी से संबंधित मामले में अंतिम आदेश पारित करेंगे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस एजेंसी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 अथवा लागू अन्य कानूनों के तहत जब्ती की सूचना संबंधित मजिस्ट्रेट को देना अनिवार्य होगा। यदि तीन माह के भीतर आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है, तो याचिकाकर्ता को संबंधित पुलिस एजेंसी को सूचना देकर फिक्स्ड डिपॉजिट में रखी विवादित राशि निकालने की अनुमति भी मिल सकती है।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने बैंक खाते को तत्काल डी-फ्रीज करने का निर्देश देते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया। यह फैसला साइबर अपराध की जांच के दौरान बैंक खाते फ्रीज करने की वैधानिक प्रक्रिया और खाताधारकों के अधिकारों के संबंध में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मार्गदर्शन माना जा रहा है।
