इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी अपराध से जुड़े मुवक्किल द्वारा अपने अधिवक्ता को दी गई पेशेवर फीस को काली कमाई या अपराध से अर्जित धन नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी अधिवक्ता का पूरा बैंक खाता फ्रीज करना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी कार्रवाई से न केवल अधिवक्ता की आजीविका प्रभावित होती है, बल्कि न्यायिक कार्य भी बाधित हो सकता है।
यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की गई जिसमें कानपुर नगर के अधिवक्ता आयुष वाजपेयी ने अपने भारतीय स्टेट बैंक की कृष्णा नगर शाखा स्थित बचत खाते को साइबर सेल के अनुरोध पर फ्रीज किए जाने को चुनौती दी थी। अधिवक्ता को बैंक से जानकारी मिली थी कि साइबर अपराध से जुड़े एक कथित लेनदेन के आधार पर उनके खाते पर रोक लगा दी गई है।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने राज्य सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से दो सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह जानना चाहा है कि पुलिस द्वारा अधिवक्ताओं के बैंक खाते फ्रीज करने जैसी कार्रवाइयों को किस प्रकार विनियमित किया जाएगा ताकि न्यायिक कार्यों में अनावश्यक बाधा उत्पन्न न हो।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि वह पेशे से अधिवक्ता हैं और उनके बैंक खाते में उनके मुवक्किलों द्वारा कानूनी सेवाओं के बदले अधिवक्ता शुल्क जमा किया जाता है। उनका कहना था कि यह उनकी पेशेवर आय है, जिसे किसी भी परिस्थिति में अपराध से अर्जित धन या अवैध कमाई नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अपने पूर्ववर्ती निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी बैंक खाते में किसी संदिग्ध या धोखाधड़ी वाले लेनदेन की जांच की जानी है, तो पुलिस या साइबर सेल की कार्रवाई केवल उस संदिग्ध राशि तक सीमित होनी चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना प्रत्येक मामले में उचित या अनुपातिक कदम नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को विधिक सहायता प्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार है और वह अपने अधिवक्ता को पेशेवर सेवाओं के बदले फीस का भुगतान कर सकता है। ऐसी फीस अधिवक्ता की वैध पेशेवर आय है और केवल इस कारण उसे अपराध की आय या काली कमाई नहीं माना जा सकता कि भुगतान करने वाला व्यक्ति किसी आपराधिक मामले का आरोपी है।
फिलहाल मामले की सुनवाई जारी है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है और संकेत दिया है कि भविष्य में ऐसी कार्रवाइयों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश आवश्यक हो सकते हैं, ताकि साइबर अपराध की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बीच उचित संतुलन बना रहे।
