संगठित साइबर अपराध के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए लखनऊ पुलिस ने चार कथित म्यूल अकाउंट ऑपरेटरों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि ये लोग फर्जी कंपनियां बनाकर दूसरों के नाम पर बैंक खाते खुलवाते थे और उन्हीं खातों का इस्तेमाल देशभर में होने वाली साइबर ठगी की रकम को ट्रांसफर करने और खपाने के लिए करते थे। जांचकर्ताओं के अनुसार, आरोपियों के कब्जे से मिले बैंक खातों के खिलाफ देश के विभिन्न राज्यों से हजारों शिकायतें दर्ज हैं।
पुलिस ने आवास विकास योजना स्थित लाइट हाउस अपार्टमेंट के एक फ्लैट पर छापेमारी कर निप्पू कुमार, मनीष कुमार, सन्नी और सत्येन्द्र को गिरफ्तार किया। छापे के दौरान आरोपी लैपटॉप और मोबाइल फोन के जरिए विभिन्न बैंक खातों में ऑनलाइन लेनदेन कर रहे थे। गिरफ्तार आरोपियों में तीन बिहार के पूर्वी चंपारण और एक उत्तर प्रदेश के उन्नाव का निवासी है।
तलाशी के दौरान पुलिस ने 79 चेकबुक, 77 डेबिट कार्ड, 29 सिम कार्ड, 15 स्मार्टफोन, 14 फीचर फोन, छह पॉइंट-ऑफ-सेल (POS) मशीनें और तीन लैपटॉप बरामद किए। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि इन बैंक खातों का इस्तेमाल कथित रूप से साइबर ठगी, ऑनलाइन बेटिंग और अन्य अवैध गतिविधियों से अर्जित धन को प्राप्त करने, ट्रांसफर करने और छिपाने के लिए किया जाता था।
पुलिस ने बरामद बैंक खातों का राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर सत्यापन किया, जिसमें पता चला कि इन खातों के खिलाफ देशभर से हजारों शिकायतें दर्ज हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह गिरोह लंबे समय से साइबर अपराधियों के लिए संगठित बैंकिंग नेटवर्क उपलब्ध करा रहा था।
पूछताछ में आरोपियों ने कथित रूप से बताया कि वे दूसरे राज्यों के लोगों को विभिन्न प्रलोभन देकर उनके पहचान संबंधी दस्तावेज हासिल करते थे। इसके बाद केवाईसी अपडेट कराने के बहाने आधार कार्ड में पता बदलकर उन्हें उत्तर प्रदेश का निवासी दर्शाया जाता था। फिर उनके नाम पर फर्जी कंपनियां पंजीकृत कराकर उन्हें निदेशक या संचालक दिखाया जाता था और दस से अधिक बैंकों में चालू खाते खुलवाए जाते थे।
इन खातों से जुड़ी चेकबुक, डेबिट कार्ड, सिम कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी को एक पैकेज के रूप में तैयार कर साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराया जाता था। साइबर जगत में इसे सामान्यतः “म्यूल किट” कहा जाता है। ऐसे खातों का उपयोग ठगी की रकम को कई स्तरों पर विभिन्न खातों में भेजकर उसकी वास्तविक स्रोत पहचान छिपाने के लिए किया जाता है। बाद में धनराशि को डिजिटल भुगतान माध्यमों और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए आगे ट्रांसफर किया जाता था, जिससे जांच एजेंसियों के लिए धन के प्रवाह का पता लगाना कठिन हो जाता था।
प्रारंभिक जांच से संकेत मिले हैं कि यह नेटवर्क केवल बैंक खाते उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं था, बल्कि संगठित साइबर अपराध गिरोहों को वित्तीय चैनल उपलब्ध कराने का भी काम कर रहा था। पुलिस अब बरामद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, बैंकिंग दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड की फॉरेंसिक जांच कर रही है, ताकि गिरोह से जुड़े अन्य सदस्यों और लाभार्थियों की पहचान की जा सके।
इस मामले पर प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि म्यूल अकाउंट नेटवर्क आज संगठित साइबर अपराध की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि साइबर ठग अपने स्वयं के बैंक खातों का उपयोग करने के बजाय फर्जी कंपनियों और दूसरों के नाम पर खोले गए खातों के माध्यम से चोरी की रकम को कई स्तरों पर घुमाते हैं, ताकि कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जांच से बचा जा सके। उन्होंने लोगों से अपील की कि बिना पूरी तरह सत्यापन किए किसी भी व्यक्ति के साथ अपने पहचान दस्तावेज, बैंक खाता, सिम कार्ड या केवाईसी संबंधी जानकारी साझा न करें तथा किसी भी संदिग्ध वित्तीय गतिविधि की तुरंत संबंधित एजेंसियों को सूचना दें।
