दिल्ली में दवाओं, मेडिकल उपकरणों और सर्जिकल सामग्री की खरीद में कथित तौर पर ₹600 करोड़ से अधिक की वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बाद भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) ने प्राथमिकी दर्ज कर विस्तृत जांच शुरू कर दी है। यह कार्रवाई दिल्ली सरकार के सतर्कता विभाग की शिकायत के आधार पर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि कुछ अधिकारियों और आपूर्तिकर्ताओं की कथित मिलीभगत से आवश्यक चिकित्सा सामग्री की खरीद बाजार दर से कई गुना अधिक कीमत पर की गई, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ।
शिकायत के अनुसार, महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं (DGHS) के तहत की गई कई खरीद प्रक्रियाओं में निर्धारित बाजार मूल्य की तुलना में अत्यधिक कीमतों पर सामान खरीदा गया। जांच एजेंसियों का आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया में कथित हेरफेर कर कुछ चुनिंदा आपूर्तिकर्ताओं को लाभ पहुंचाया गया और इसी माध्यम से करोड़ों रुपये का कथित वित्तीय नुकसान हुआ।
मामले की जांच के दौरान पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों की खरीद में बड़ी मूल्य विसंगति सामने आने का दावा किया गया है। एफआईआर के अनुसार, जिन मशीनों जैसी विशिष्टताओं वाले उपकरण अन्य अस्पतालों में लगभग ₹10 लाख प्रति यूनिट की दर से खरीदे गए थे, उन्हें कथित तौर पर ₹33 लाख प्रति यूनिट की दर से खरीदा गया। कुल 448 मशीनों की खरीद पर लगभग ₹148 करोड़ खर्च किए गए, जबकि उनका अनुमानित बाजार मूल्य करीब ₹45 करोड़ बताया गया है।
इसी प्रकार, बेडशीट की खरीद में भी गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया गया है। शिकायत के अनुसार, जहां अन्य अस्पतालों में समान गुणवत्ता की बेडशीट लगभग ₹150 प्रति पीस खरीदी गईं, वहीं डीजीएचएस ने कथित तौर पर ₹450 प्रति पीस का भुगतान किया। आरोप है कि इस खरीद पर लगभग ₹75 करोड़ खर्च किए गए, जबकि वास्तविक बाजार मूल्य लगभग ₹25 करोड़ था।
एफआईआर में सी-आर्म रेडियोलॉजिकल उपकरणों की खरीद का भी उल्लेख किया गया है। जांच के अनुसार, जिन मशीनों का बाजार मूल्य लगभग ₹25 लाख प्रति यूनिट था, उन्हें कथित तौर पर ₹1.10 करोड़ प्रति यूनिट की दर से खरीदा गया। इन उपकरणों की खरीद पर कुल ₹7.7 करोड़ खर्च किए गए, जबकि उनकी अनुमानित वास्तविक कीमत लगभग ₹1.75 करोड़ बताई गई है।
शिकायत में ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्ट (ORS) की खरीद को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, जहां अन्य अस्पतालों में ORS के एक सैशे की कीमत लगभग ₹2.05 थी, वहीं कथित तौर पर ₹15 प्रति सैशे की दर से खरीद की गई। आरोप है कि लगभग ₹7.5 करोड़ का भुगतान ऐसी आपूर्ति के लिए किया गया जिसकी वास्तविक कीमत लगभग ₹1.25 करोड़ थी। इसके अतिरिक्त, सर्जिकल सामग्री की खरीद में भी करीब ₹100 करोड़ का भुगतान किए जाने का दावा किया गया है, जबकि उपलब्ध कराई गई सामग्री का अनुमानित मूल्य केवल ₹20–25 करोड़ बताया गया है।
इस मामले में दो वरिष्ठ अधिकारियों की गिरफ्तारी के बाद जांच और तेज हो गई है। एसीबी अब टेंडर दस्तावेज, मूल्य निर्धारण, खरीद स्वीकृतियों, भुगतान रिकॉर्ड तथा संबंधित अधिकारियों और आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका की विस्तृत जांच कर रही है। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि क्या खरीद प्रक्रिया में भ्रष्टाचार, आपराधिक साजिश, कदाचार और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े अपराध किए गए।
मामले को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। विपक्ष ने खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जबकि दिल्ली सरकार का कहना है कि जांच के निष्कर्षों के आधार पर उचित कार्रवाई की जाएगी। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ पक्ष का दावा है कि सरकार ने शिकायत का इंतजार किए बिना स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरू की। जांच एजेंसियां अब वित्तीय रिकॉर्ड, टेंडर प्रक्रिया और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर पूरे मामले की तह तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं।
