गुजरात में एक बड़े मेडिकल फ्रॉड का खुलासा हुआ है, जिसमें 1,140 ब्लड प्लाज्मा यूनिट्स में मिलावट किए जाने और उन्हें एक अंतरराज्यीय नेटवर्क के जरिए सप्लाई करने का आरोप सामने आया है। अहमदाबाद ग्रामीण पुलिस की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) की शुरुआती जांच में पाया गया है कि बरामद प्लाज्मा यूनिट्स गंभीर रूप से दूषित, असुरक्षित और मानव जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाली थीं।
अधिकारियों के अनुसार आरोपी एक संगठित रैकेट चला रहे थे, जिसमें असली ब्लड प्लाज्मा का आंशिक रूप से निष्कर्षण किया जाता था और उसकी जगह सलाइन घोल मिलाकर मात्रा को पूरा दिखाया जाता था। इस प्रक्रिया के जरिए रिकॉर्ड में हेरफेर कर वास्तविक मेडिकल-ग्रेड प्लाज्मा को सिस्टम से बाहर निकाल लिया जाता था, जबकि मिलावटी और घटिया गुणवत्ता वाला प्लाज्मा सप्लाई चैन में आगे भेजा जाता था।
जांच में सामने आए मुख्य आरोपियों में दिनेश चौधरी, लैब मालिक मोहन गायकवाड़ और उनके दो सहयोगियों के नाम शामिल हैं। पुलिस के मुताबिक यह रैकेट कई महीनों से सक्रिय था और शुरुआती चरण में इसकी गतिविधियां सामान्य जांच में पकड़ में नहीं आ पाईं।
अहमदाबाद के बीजे मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग ने बरामद नमूनों की विस्तृत जांच की, जिसमें पुष्टि हुई कि सभी 1,140 यूनिट्स में मिलावट की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार यह प्लाज्मा चिकित्सा उपयोग के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त था, जिसके बाद तत्काल प्रभाव से इसे नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
जांच एजेंसियों का कहना है कि यह पूरा रैकेट एक सुनियोजित सप्लाई मॉडल पर काम कर रहा था। वैध स्रोतों से प्राप्त उच्च गुणवत्ता वाले प्लाज्मा को बीच में ही निकालकर अन्य चैनलों में भेजा जाता था, जबकि उसकी जगह सलाइन मिलाकर भंडारण और रिकॉर्ड में संतुलन दिखाया जाता था।
प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि यह डाइवर्ट किया गया प्लाज्मा महाराष्ट्र के कई ब्लड बैंकों तक पहुंचाया गया, जिनमें वाशिम, अहमदनगर, धुले, नासिक, भुसावल, छत्रपति संभाजीनगर और जालना जैसे जिले शामिल हैं। अब जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि कहीं यह सामग्री अनजाने में फार्मास्यूटिकल कंपनियों तक तो नहीं पहुंची।
अहमदाबाद ग्रामीण पुलिस अधीक्षक ओम प्रकाश जाट ने बताया कि मामले की जांच को गुजरात से बाहर भी विस्तार दिया गया है। विभिन्न राज्यों की नियामक एजेंसियों, फूड एंड ड्रग्स विभाग और ब्लड ट्रांसफ्यूजन से जुड़े संस्थानों के साथ समन्वय कर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि अब तक की जांच में यह प्रमाण नहीं मिला है कि यह मिलावटी प्लाज्मा गुजरात के सरकारी अस्पतालों या ब्लड बैंक सिस्टम में पहुंचा हो, लेकिन इसकी व्यापक जांच अभी जारी है।
जांच में यह भी आशंका जताई जा रही है कि आरोपियों ने रिकॉर्ड में हेरफेर और लेनदेन को छिपाने के लिए लैब प्रक्रियाओं में जानबूझकर बदलाव किए। डिजिटल उपकरणों, बैंकिंग रिकॉर्ड और ट्रांसपोर्ट दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच भी की जा रही है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार इस पूरे नेटवर्क में और लोगों की संलिप्तता सामने आ सकती है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि इस रैकेट से जुड़े आर्थिक लेनदेन और सप्लाई चेन कितनी दूर तक फैली हुई थी।
यह मामला स्वास्थ्य व्यवस्था में निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण की गंभीर खामियों को उजागर करता है, जहां जीवन रक्षक मेडिकल सामग्री में इस तरह की बड़ी हेराफेरी लंबे समय तक बिना पकड़ में आए चलती रही।
