फर्जी मार्कशीट और डिग्री तैयार करने वाले कथित संगठित गिरोह के खिलाफ जांच अब और तेज हो गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जल्द ही मामले में आरोपियों की संपत्तियों और वित्तीय लेनदेन की जांच शुरू करेगा। विशेष जांच दल (एसआईटी) की प्रारंभिक पड़ताल में आरोपियों के बैंक खातों में करोड़ों रुपये के लेनदेन तथा कई अचल संपत्तियों की जानकारी सामने आने के बाद यह कार्रवाई आगे बढ़ाई जा रही है। पुलिस के अनुसार किदवईनगर और बेकनगंज से पकड़े गए दोनों गिरोहों के आरोपियों की संपत्तियों का विस्तृत ब्यौरा तैयार किया जा रहा है, जिसे शीघ्र ही ईडी को सौंपा जाएगा। वहीं एसआईटी मामले के अन्य पहलुओं की जांच पहले की तरह जारी रखेगी।
जांच के अनुसार 18 फरवरी को किदवईनगर क्षेत्र से एक कथित फर्जी मार्कशीट और डिग्री गिरोह का भंडाफोड़ किया गया था। पुलिस ने मौके से नौ राज्यों के 14 विश्वविद्यालयों की मार्कशीट और डिग्रियां बरामद की थीं। जांच एजेंसियों के अनुसार गिरोह का कथित सरगना प्रयागराज के ऊंचाहार क्षेत्र का निवासी शैलेंद्र ओझा है। आरोप है कि गिरोह बिना परीक्षा दिए हाईस्कूल से लेकर बीटेक, एलएलबी, डी-फार्मा और बी-फार्मा जैसी विभिन्न शैक्षणिक एवं व्यावसायिक डिग्रियां मोटी रकम लेकर उपलब्ध कराता था।
जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह का नेटवर्क उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मणिपुर, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, सिक्किम सहित कई राज्यों तक फैला हुआ था। पुलिस का आरोप है कि इस अवैध कारोबार से अर्जित धन के माध्यम से शैलेंद्र ओझा ने करोड़ों रुपये की संपत्तियां बनाई। जांच में साकेतनगर में लगभग ₹50 लाख का अपार्टमेंट, पनकी में करीब ₹30 लाख का फ्लैट, रमईपुर में लगभग ₹75 लाख का प्लॉट, बिधनू क्षेत्र में दो भूखंड तथा करीब ₹20 लाख मूल्य की एक लग्जरी कार खरीदे जाने की जानकारी मिली है। इन संपत्तियों के वित्तीय स्रोतों की भी जांच की जा रही है।
एसआईटी की जांच में गिरोह के अन्य आरोपियों के बैंक खातों में भी बड़े पैमाने पर वित्तीय लेनदेन सामने आए हैं। पुलिस के अनुसार कौशांबी निवासी नागेंद्र मणि त्रिपाठी, गाजियाबाद निवासी जोगेंद्र, शुक्लागंज निवासी अश्वनी कुमार तथा बाद में गिरफ्तार किए गए अन्य आरोपियों के खातों में भी करोड़ों रुपये के लेनदेन का पता चला है। इन सभी वित्तीय रिकॉर्ड का विश्लेषण कर यह पता लगाया जा रहा है कि कथित अवैध कमाई का उपयोग किन-किन संपत्तियों में किया गया।
इसी बीच आठ जून को बेकनगंज क्षेत्र से पकड़े गए दूसरे गिरोह की जांच भी अब एसआईटी को सौंप दी गई है। इस मामले में जियाउल हसन उर्फ समीर, नूरद्दीन, हसन आसिफ और आमिर अहमद को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के अनुसार इनके कब्जे से आठ विश्वविद्यालयों की 62 तैयार फर्जी मार्कशीट एवं डिग्रियां, प्रिंटर तथा अन्य उपकरण बरामद किए गए थे। जांच में जियाउल हसन के बैंक खाते में लगभग ₹40 लाख तथा आमिर अहमद के खाते में ₹1 करोड़ से अधिक के लेनदेन की जानकारी भी सामने आई है।
पुलिस का कहना है कि दोनों मामलों में आरोपियों की चल और अचल संपत्तियों का पूरा विवरण संकलित किया जा रहा है। इसके बाद यह रिकॉर्ड ईडी को सौंपा जाएगा, ताकि धन शोधन और अवैध संपत्तियों से जुड़े पहलुओं की स्वतंत्र जांच की जा सके। एसआईटी समानांतर रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले नेटवर्क, विश्वविद्यालयों के नाम के कथित दुरुपयोग, डिजिटल साक्ष्यों, बैंकिंग ट्रेल और अन्य संभावित सहयोगियों की भूमिका की भी जांच जारी रखे हुए है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का कारोबार केवल धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसके माध्यम से अवैध धन अर्जित कर उसे विभिन्न संपत्तियों में निवेश किए जाने की आशंका भी रहती है। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में वित्तीय जांच, बैंकिंग ट्रेल, डिजिटल साक्ष्य और मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं की गहन पड़ताल आवश्यक होती है, ताकि पूरे संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश किया जा सके।
