भारत में डिजिटल भुगतान का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ साइबर ठगी और ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के मामले भी चिंताजनक गति से बढ़ रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, देश में दर्ज कुल वित्तीय धोखाधड़ी के लगभग 74 प्रतिशत मामले कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि डिजिटल लेनदेन की बढ़ती लोकप्रियता के साथ साइबर अपराधी भी नए-नए तरीकों से लोगों को निशाना बना रहे हैं।
ऑनलाइन शॉपिंग, यात्रा बुकिंग, बिल भुगतान और अन्य डिजिटल सेवाओं के बढ़ते उपयोग ने आम लोगों के जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसी सुविधा का फायदा उठाकर साइबर ठग भी अपने जाल को लगातार मजबूत कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, फिशिंग लिंक, फर्जी ग्राहक सेवा कॉल, नकली मोबाइल एप्लिकेशन और सोशल इंजीनियरिंग जैसी तकनीकें अब साइबर अपराधियों के सबसे प्रभावी हथियार बन चुकी हैं।
वित्तीय क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि बैंक और भुगतान कंपनियां लगातार अपनी सुरक्षा प्रणालियों को मजबूत कर रही हैं, लेकिन तकनीकी सुरक्षा के साथ-साथ ग्राहकों की जागरूकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। साइबर अपराधी अक्सर खुद को बैंक अधिकारी, क्रेडिट कार्ड प्रतिनिधि, ग्राहक सेवा कर्मचारी या वित्तीय सलाहकार बताकर लोगों का विश्वास जीतते हैं और फिर संवेदनशील जानकारी हासिल कर लेते हैं।
हाल के वर्षों में कार्ड अपग्रेड, क्रेडिट लिमिट बढ़ाने, रिवॉर्ड पॉइंट रिडीम कराने, केवाईसी अपडेट करने या खाते को सक्रिय रखने जैसे बहानों से की जाने वाली फर्जी कॉलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। कई मामलों में अपराधी पीड़ितों पर तत्काल कार्रवाई का दबाव बनाते हैं ताकि वे बिना सोचे-समझे ओटीपी, कार्ड नंबर, सीवीवी या अन्य गोपनीय जानकारी साझा कर दें।
साइबर अपराधी अब फर्जी डिलीवरी संदेश, नकली ई-चालान, झूठे टैक्स नोटिस और अकाउंट ब्लॉक होने की चेतावनी वाले संदेशों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। इन संदेशों में भेजे गए लिंक उपयोगकर्ताओं को नकली वेबसाइटों पर ले जाते हैं, जहां उनकी बैंकिंग और कार्ड संबंधी जानकारी चोरी कर ली जाती है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि आज अधिकांश साइबर अपराध तकनीकी कमजोरी से ज्यादा मानवीय मनोविज्ञान का फायदा उठाकर किए जाते हैं। उनके अनुसार, साइबर ठग पहले व्यक्ति का भरोसा जीतते हैं और फिर डर, लालच या जल्दबाजी की भावना पैदा कर उससे संवेदनशील जानकारी हासिल कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी ओटीपी, पासवर्ड या बैंकिंग जानकारी को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि ऑनलाइन खरीदारी या भुगतान हमेशा विश्वसनीय और आधिकारिक वेबसाइटों तथा प्लेटफॉर्मों के माध्यम से ही किया जाना चाहिए। किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक करने या सोशल मीडिया के माध्यम से प्राप्त ऑफर पर भरोसा करने से पहले उसकी जांच करना आवश्यक है।
मोबाइल एप्लिकेशन केवल अधिकृत ऐप स्टोर से ही डाउनलोड करने चाहिए। एपीके फाइलों या अनजान स्रोतों से भेजे गए एप्लिकेशन डिवाइस में मैलवेयर स्थापित कर सकते हैं, जिससे बैंकिंग डेटा और निजी जानकारी खतरे में पड़ सकती है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि उपयोगकर्ता अपने बैंक खातों और कार्डों के लिए ट्रांजैक्शन अलर्ट सक्रिय रखें, नियमित रूप से बैंक स्टेटमेंट की समीक्षा करें और प्रत्येक डिजिटल खाते के लिए अलग तथा मजबूत पासवर्ड का उपयोग करें। किसी भी संदिग्ध लेनदेन की स्थिति में तुरंत बैंक को सूचित करना और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराना नुकसान को सीमित कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ साइबर सुरक्षा अब केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी का भी विषय बन चुकी है। ऐसे में जागरूकता, सतर्कता और सुरक्षित डिजिटल व्यवहार ही ऑनलाइन ठगी के बढ़ते खतरे से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
