कानपुर। शिवराजपुर क्षेत्र में पुलिस ने एक बड़े साइबर ठगी सिंडिकेट का भंडाफोड़ करते हुए लगभग ₹225 करोड़ (करीब 2.25 अरब रुपये) के अवैध लेन-देन से जुड़े नेटवर्क का खुलासा किया है। यह गिरोह पिछले तीन वर्षों से सक्रिय था और देशभर में लोगों को म्यूल बैंक खातों, क्रिप्टो करेंसी और फर्जी कॉलिंग के जरिए निशाना बना रहा था। पुलिस ने गिरोह के छह प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि लगभग छह अन्य आरोपी अभी फरार हैं।
यह कार्रवाई NCRP (नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल) और ‘प्रतिबिंब’ ऐप पर लगातार 27 शिकायतें दर्ज होने के बाद की गई। शिकायतों के आधार पर पुलिस ने बहरमापुर गांव के पास कच्ची सड़क पर छापा मारा, जो इस नेटवर्क का मुख्य संचालन केंद्र बताया जा रहा है।
गिरफ्तार आरोपियों में कथित मास्टरमाइंड रंजन कटियार (ठठिया, कन्नौज), सूरज कुमार (अरौल), अशरफ खान, राजदीप, भीमरतन और कमल (शिवराजपुर क्षेत्र) शामिल हैं। पुलिस ने इनके पास से पांच मोबाइल फोन, एक टैबलेट, दस बैंक पासबुक, दो चेकबुक और बारह डेबिट कार्ड बरामद किए हैं। इस कार्रवाई में शामिल पुलिस टीम को ₹25,000 का इनाम भी दिया गया है।
जांच में सामने आया कि गिरोह ने आसपास के गांवों—कुकरी, भैसाऊ और शिवराजपुर कस्बे—तक अपना नेटवर्क फैला रखा था। ग्रामीणों को ₹5,000 से ₹10,000 तक का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए जाते थे या पुराने खाते किराए पर लिए जाते थे। इस तरह लगभग 450 म्यूल अकाउंट तैयार किए गए, जिनका उपयोग ठगी की रकम को इकट्ठा करने और वित्तीय ट्रेल को छिपाने में किया जाता था।
एक अहम खुलासे में सामने आया कि ‘श्रीरामजन सेवा केंद्र’ नामक खाते में करीब ₹10 करोड़ का लेन-देन हुआ था। इस खाते से जुड़ी 15 शिकायतें अकेले NCRP पोर्टल पर दर्ज थीं। खाते की संचालक शुभांशी नामक महिला ने पूछताछ में बताया कि उसे इन लेन-देन की कोई जानकारी नहीं थी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उसके दस्तावेजों का दुरुपयोग किया गया था।
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पुलिस के अनुसार, यह गिरोह पैसों की हेराफेरी छिपाने के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करता था। आरोपी P2P (पीयर-टू-पीयर) क्रिप्टो ट्रेडिंग के जरिए लेन-देन को कई परतों में बदल देते थे। टेलीग्राम के जरिए नेटवर्क को संचालित किया जाता था और क्रिप्टो को अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बदलकर बाद में UPI और ATM के जरिए नकद निकासी की जाती थी, जिससे जांच एजेंसियों के लिए मनी ट्रेल पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता था।
डीसीपी पश्चिम एसएम कासिम आब्दी ने बताया कि नए सदस्यों को बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता था। उन्हें सिखाया जाता था कि म्यूल खाते कैसे जुटाने हैं, कॉल पर लोगों से कैसे बात करनी है और “डिजिटल अरेस्ट” जैसी डराने वाली तकनीकों का इस्तेमाल कैसे करना है। इसी तरीके से लोगों को डराकर उनसे बड़ी रकम वसूली जाती थी।
इस पूरे नेटवर्क पर टिप्पणी करते हुए साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रोफेसर Triveni Singh ने कहा कि ऐसे गिरोह डिजिटल वित्तीय व्यवस्था की कमजोर कड़ियों का फायदा उठाते हैं, खासकर म्यूल अकाउंट और अनियमित क्रिप्टो चैनलों का। उन्होंने कहा कि जब तक बैंकिंग सिस्टम, टेलीकॉम और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच रियल-टाइम समन्वय और मजबूत KYC व्यवस्था नहीं होगी, तब तक ऐसे नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करना चुनौतीपूर्ण रहेगा।
आरोपी कॉल, व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए लोगों को डराते थे। वे पीड़ितों को यह कहकर धमकाते थे कि उनका नाम आतंकी गतिविधियों में जुड़ा है या उन्होंने अवैध वेबसाइट देखी है। डर और सामाजिक दबाव का फायदा उठाकर वे लोगों से पैसे ट्रांसफर करवा लेते थे।
पुलिस का कहना है कि यह नेटवर्क बेहद संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम था और कई राज्यों में फैला हुआ था। जांच जारी है और आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां व बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
