सीबीआई ने ₹7,623 करोड़ के कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में रिलायंस समूह की दो वित्तीय कंपनियों के पूर्व शीर्ष अधिकारियों को गिरफ्तार किया है।

करुवन्नूर बैंक घोटाले में बड़ा राजनीतिक मोड़, अदालत ने CPI(M), सांसद और विधायक के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला माना

Team The420
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कोच्चि। केरल के चर्चित करुवन्नूर सर्विस कोऑपरेटिव बैंक घोटाले में एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। विशेष धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) अदालत ने मामले में CPI(M), एक सांसद, एक विधायक तथा कई अन्य आरोपितों के खिलाफ प्रथमदृष्टया पर्याप्त आधार पाए जाने की बात कही है। अदालत के इस आदेश के बाद मामले में आगे की सुनवाई और अभियोजन का रास्ता साफ हो गया है।

यह मामला पहले ही केरल के सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के सबसे संवेदनशील वित्तीय घोटालों में गिना जा रहा है। अब अदालत के ताजा रुख ने इसे एक बड़े राजनीतिक और कानूनी विवाद का स्वरूप दे दिया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से दायर अनुपूरक अभियोजन शिकायत को स्वीकार करते हुए अदालत ने माना कि जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत सामग्री आगे की कार्रवाई के लिए पर्याप्त है।

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जांच एजेंसी ने अपनी शिकायत में कुल 29 लोगों को नामजद किया है, जिनमें एक लोकसभा सांसद, एक मौजूदा विधायक और बैंक से जुड़े कई पदाधिकारी एवं अन्य व्यक्ति शामिल हैं। अदालत की अनुमति के बाद आरोपितों को आगामी कार्यवाही के लिए समन जारी किए जाने की संभावना है।

ED के अनुसार, करुवन्नूर सहकारी बैंक में कई वर्षों तक सुनियोजित तरीके से वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया गया। जांच में आरोप लगाया गया है कि बैंक अधिकारियों, बिचौलियों, उधारकर्ताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों के नेटवर्क के माध्यम से बड़े पैमाने पर संदिग्ध ऋण स्वीकृत किए गए। कई मामलों में एक ही संपत्ति के आधार पर बार-बार ऋण दिए गए, जबकि कुछ ऋण ऐसे लोगों को भी स्वीकृत किए गए जो बैंक की पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करते थे।

जांच एजेंसी का दावा है कि फर्जी दस्तावेजों, बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई संपत्ति कीमतों और बेनामी व्यवस्थाओं के माध्यम से ऋण वितरित किए गए। बाद में इन रकमों को विभिन्न माध्यमों से स्थानांतरित कर कथित तौर पर धन शोधन की प्रक्रिया अपनाई गई।

ED का आरोप है कि लगभग ₹232 करोड़ की राशि संदिग्ध और बेनामी ऋण लेनदेन के जरिए प्रवाहित हुई, जबकि मूल ऋण घोटाले का आकार करीब ₹180 करोड़ आंका गया है। जांच के दौरान अब तक लगभग ₹128 करोड़ मूल्य की संपत्तियां और परिसंपत्तियां जब्त की जा चुकी हैं।

मामले का सबसे संवेदनशील पहलू कथित रूप से उन धनराशियों के उपयोग से जुड़ा है जो अवैध ऋण स्वीकृतियों से उत्पन्न हुईं। जांच एजेंसी का दावा है कि कुछ लाभार्थियों से प्राप्त कथित कमीशन एक विशेष फंड खाते में जमा किए गए और बाद में इन धनराशियों का उपयोग भूमि खरीद तथा भवन निर्माण गतिविधियों में किया गया।

जांच में यह भी आरोप लगाया गया है कि बैंक के संचालन पर प्रभाव रखने वाले कुछ व्यक्तियों और समितियों ने ऋण स्वीकृति प्रक्रिया को प्रभावित किया। एजेंसी का कहना है कि बड़ी संख्या में ऐसे ऋण स्वीकृत किए गए जो बाद में एनपीए में बदल गए और बैंक की वित्तीय स्थिति को गंभीर नुकसान पहुंचा।

इस घोटाले ने केरल की सहकारी बैंकिंग व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वर्षों तक चली कथित अनियमितताओं के कारण हजारों जमाकर्ताओं की बचत प्रभावित हुई। बैंक, जो कभी स्थानीय समुदायों को सुलभ वित्तीय सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, कथित तौर पर वित्तीय हेरफेर और अनियमित ऋण वितरण का केंद्र बन गया।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 30,000 से अधिक जमाकर्ताओं की करीब ₹263 करोड़ से अधिक की राशि अभी भी पूरी तरह वापस नहीं हो सकी है। हालांकि सरकार और संबंधित अधिकारियों द्वारा राहत एवं पुनर्भुगतान योजनाएं लागू की गई हैं, लेकिन खराब ऋणों, कानूनी विवादों और वसूली की जटिल प्रक्रिया के कारण समाधान अपेक्षित गति से नहीं हो पाया है।

इस बीच, मामले में लगाए गए आरोपों का संबंधित पक्षों ने खंडन किया है। उनका कहना है कि जांच और आरोप राजनीतिक कारणों से प्रेरित हैं तथा उन्होंने किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता में संलिप्तता से इनकार किया है।

आगामी सुनवाई और संभावित अभियोजन कार्रवाई के साथ करुवन्नूर बैंक घोटाला अब केरल की सबसे चर्चित वित्तीय और राजनीतिक कानूनी लड़ाइयों में से एक बन गया है। इस मामले का असर न केवल सहकारी बैंकिंग क्षेत्र बल्कि सार्वजनिक संस्थाओं में लोगों के विश्वास और जवाबदेही व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

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