मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में सामने आए एक बड़े प्रशासनिक और डिजिटल पहचान घोटाले ने सुरक्षा और साइबर सिस्टम की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) से जुड़े इस मामले में 87,000 से अधिक फर्जी जन्म प्रमाणपत्र अवैध तरीके से जारी किए जाने का खुलासा हुआ है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुंबई पुलिस ने विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है, जो अब पूरे नेटवर्क और संभावित साजिश की तह तक पहुंचने में जुटा है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि यह पूरा फर्जीवाड़ा BMC के स्वास्थ्य विभाग के भीतर एक अनधिकृत SAP सिस्टम के जरिए संचालित किया गया। आरोप है कि केंद्र सरकार के अनिवार्य Civil Registration System (CRS) पोर्टल को बायपास कर अलग डिजिटल माध्यम से डेटा एंट्री की गई, जिसके जरिए हजारों अवैध दस्तावेज तैयार किए गए।
आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2024 से 2026 के बीच कुल 87,347 जन्म प्रमाणपत्र बिना वैध सत्यापन प्रक्रिया के जारी किए गए। यह मामला तब उजागर हुआ जब एक आंतरिक शिकायत के आधार पर जांच शुरू की गई, जिसके बाद SIT गठन का निर्णय लिया गया।
SIT का नेतृत्व मुंबई क्राइम ब्रांच के जॉइंट कमिश्नर लक्ष्मी गौतम कर रहे हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह मामला केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि एक संगठित डिजिटल पहचान धोखाधड़ी नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है, जिसमें कई स्तरों पर अंदरूनी सहयोग की आशंका है।
जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि कुछ मेडिकल ऑफिसर्स ऑफ हेल्थ (MOH) के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जा चुकी है। इनमें अंधेरी (K East), दहिसर (R North), भायखला (E Ward) और कुर्ला (L Ward) जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जहां ट्रांसफर और सस्पेंशन की कार्रवाई हुई है।
सबसे गंभीर चिंता यह है कि इन फर्जी जन्म प्रमाणपत्रों का उपयोग अन्य महत्वपूर्ण पहचान दस्तावेजों जैसे आधार कार्ड, बैंकिंग KYC और सरकारी योजनाओं में लाभ लेने के लिए किया जा सकता है। इससे देश की पहचान सत्यापन प्रणाली और डेटा सुरक्षा ढांचे पर व्यापक खतरे की आशंका जताई जा रही है।
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राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला गरमा गया है। वरिष्ठ नेता किरिट सोमैया ने आरोप लगाया है कि इस घोटाले को दबाने की कोशिश की गई और वास्तविक आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया। उन्होंने इसे एक बड़े संगठित तंत्र से जुड़ा मामला बताया है।
साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने इस पूरे प्रकरण पर कहा कि यह मामला आधुनिक डिजिटल गवर्नेंस की कमजोरियों को उजागर करता है। उनके अनुसार, “जब सरकारी सिस्टम में एक्सेस कंट्रोल कमजोर होता है और पोर्टल बायपास कर डेटा एंट्री संभव हो जाती है, तो यह एक बड़े स्तर के साइबर-फाइनेंशियल फ्रॉड का रूप ले लेता है। यह केवल दस्तावेजों की हेराफेरी नहीं, बल्कि डिजिटल पहचान चोरी का संगठित मॉडल है।”
इसी बीच, Future Crime Research Foundation से जुड़े विशेषज्ञों ने भी इस मामले को लेकर चेतावनी जारी की है। संस्था का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ते डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम के साथ यदि मजबूत साइबर ऑडिट और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग नहीं अपनाई गई, तो ऐसे घोटाले भविष्य में और बड़े पैमाने पर सामने आ सकते हैं।
जांच एजेंसियों ने अब सर्वर लॉग्स, यूजर एक्सेस रिकॉर्ड और डिजिटल ट्रांजैक्शन डेटा को सुरक्षित कर फॉरेंसिक ऑडिट शुरू कर दिया है। शुरुआती विश्लेषण में कई अनधिकृत लॉगिन और संदिग्ध डेटा एंट्री पैटर्न पाए गए हैं, जिनकी गहन जांच की जा रही है।
अधिकारियों के अनुसार, अब तक 236 मामलों की पहचान की जा चुकी है, जिनमें से 137 पर प्रशासनिक कार्रवाई पूरी हो चुकी है, जबकि बाकी मामलों की जांच SIT को सौंपी गई है।
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी भी स्तर पर आपराधिक साजिश या लापरवाही साबित होती है, तो कठोर कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल SIT पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी है और आने वाले दिनों में इस घोटाले से जुड़े और बड़े खुलासों की संभावना जताई जा रही है।
