अदालत की सख्त टिप्पणी—गिरोह के सदस्य ‘मामूली सहभागी’ नहीं, संगठित साइबर अपराध में सक्रिय भूमिका का आरोप; जांच एजेंसियों को बड़े नेटवर्क की तलाश जारी

“दिल्ली का सबसे बड़ा ‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटाला: ₹22.92 करोड़ की साइबर ठगी में आरोपियों को राहत नहीं, हाईकोर्ट ने जमानत याचिका खारिज की”

Roopa
By Roopa
5 Min Read

नई दिल्ली। देश की राजधानी में सामने आए अब तक के सबसे बड़े ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगी मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी है। करीब ₹22.92 करोड़ की इस संगठित धोखाधड़ी को लेकर अदालत ने स्पष्ट कहा कि आरोपियों की भूमिका को किसी भी तरह से “मामूली या सहायक” नहीं माना जा सकता।

यह मामला उस तेजी से बढ़ते साइबर अपराध पैटर्न से जुड़ा है, जिसमें अपराधी खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसियों या जांच अधिकारियों के रूप में पेश कर पीड़ितों को डिजिटल तरीके से “अरेस्ट” करने का डर दिखाते हैं और उनसे भारी रकम वसूलते हैं।

डर, दबाव और डिजिटल गिरफ्तारी का जाल

जांच के अनुसार, यह पूरा नेटवर्क सुनियोजित तरीके से काम करता था। पीड़ितों को फोन कॉल, वीडियो कॉल या मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए यह बताया जाता था कि उनके नाम किसी गंभीर अपराध या मनी लॉन्ड्रिंग केस में जुड़ गए हैं और उन्हें तुरंत “डिजिटल कस्टडी” में लिया जा रहा है।

इसके बाद पीड़ितों को मानसिक दबाव में डालकर उनसे बैंक ट्रांसफर, UPI पेमेंट और अन्य डिजिटल माध्यमों से बड़ी रकम वसूली जाती थी। यह पूरा ऑपरेशन एक संगठित कॉल-सेंटर स्टाइल सेटअप के जरिए चलाया जाता था, जिसमें अलग-अलग लोग स्क्रिप्ट के आधार पर बातचीत करते थे।

₹22.92 करोड़ का विशाल साइबर फ्रॉड नेटवर्क

इस मामले में कुल धोखाधड़ी ₹22.92 करोड़ तक पहुंचने की पुष्टि हुई है, जिससे यह राजधानी के सबसे बड़े डिजिटल अरेस्ट घोटालों में से एक बन गया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह नेटवर्क सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार कई राज्यों और विदेशी ठिकानों तक जुड़े होने की आशंका है।

पीड़ितों में ज्यादातर वे लोग शामिल हैं जिन्हें डर और भ्रम की स्थिति में रखकर बार-बार पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया। कई मामलों में पीड़ितों को यह भी कहा गया कि यदि उन्होंने सहयोग नहीं किया तो उनकी गिरफ्तारी तुरंत प्रभाव से हो जाएगी।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस तरह के संगठित साइबर अपराधों में शामिल लोगों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि यह केवल व्यक्तिगत धोखाधड़ी का मामला नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित आपराधिक संरचना है, जिसमें हर आरोपी की भूमिका महत्वपूर्ण प्रतीत होती है।

अदालत ने यह भी माना कि प्रारंभिक साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की भूमिका सक्रिय और योजनाबद्ध लगती है, इसलिए उन्हें जमानत देने से जांच प्रभावित हो सकती है।

FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference

डिजिटल अरेस्ट स्कैम का बढ़ता खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे घोटाले तेजी से बढ़ रहे हैं, क्योंकि अपराधी अब पारंपरिक ठगी के बजाय मनोवैज्ञानिक दबाव और तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। इस तरह के मामलों में पीड़ितों को समय नहीं दिया जाता और उन्हें लगातार डराकर निर्णय लेने पर मजबूर किया जाता है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ इस तरह के मामलों को “सोशल इंजीनियरिंग आधारित हाई-इम्पैक्ट फ्रॉड” बताते हैं, जिसमें तकनीक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक नियंत्रण का इस्तेमाल होता है।

नेटवर्क की जांच और आगे की कार्रवाई

जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क के वित्तीय लेन-देन, कॉल रिकॉर्ड्स और डिजिटल वॉलेट्स की गहराई से जांच कर रही हैं। यह भी पता लगाया जा रहा है कि क्या इस गिरोह के पीछे कोई अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट काम कर रहा था।

अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के मामलों में म्यूल अकाउंट्स, फर्जी KYC और क्रिप्टो या डिजिटल वॉलेट्स का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जिससे पैसे की ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है।

पीड़ितों के लिए बढ़ती चिंता

इस घोटाले में कई पीड़ितों ने मानसिक और आर्थिक दोनों तरह की क्षति झेली है। कई मामलों में लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत गंवा दी, जबकि कुछ ने लोन लेकर भी पैसे ट्रांसफर किए।

फिलहाल अदालत के इस फैसले के बाद जांच एजेंसियों को और मजबूती मिली है, और उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में इस बड़े डिजिटल अरेस्ट नेटवर्क के और भी अहम खुलासे सामने आ सकते हैं।

हमसे जुड़ें

Share This Article