कोटा। साइबर अपराध की दुनिया में एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जहां एक अंतरराष्ट्रीय स्तर से जुड़ा ठगी नेटवर्क पाकिस्तान के हैंडलर के इशारे पर संचालित हो रहा था। इस नेटवर्क का मास्टरमाइंड मोहम्मद अमजद (21) इंजीनियरिंग का छात्र निकला, जो करीब डेढ़ साल से इस गिरोह के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ था। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गिरोह ने 50 से अधिक बैंक खातों के माध्यम से करीब ₹43.50 लाख की ठगी को अंजाम दिया।
जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी अपने तीन सहयोगियों के साथ मिलकर पूरे नेटवर्क को चला रहा था, जिनमें दीपक, राहुल और विजय शामिल हैं। इन लोगों का काम मजदूरों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को लालच देकर उनके बैंक खाते, एटीएम कार्ड, सिम और पासबुक हासिल करना था। हर खाते के बदले उन्हें ₹7,000 तक कमीशन दिया जाता था। यह पूरा सेट ‘बैंक अकाउंट किट’ के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जिससे साइबर ठगी की रकम अलग-अलग खातों में घुमाई जाती थी।
सूत्रों के अनुसार, अमजद के पास खुद के भी पांच बैंक खाते थे, जिनका उपयोग वह ठगी की रकम को आगे ट्रांसफर और छिपाने के लिए करता था। जांच में लगभग ₹10 लाख की राशि उसके खातों में जमा होने के संकेत मिले हैं। इसके अलावा आरोपी के पास से 9 मोबाइल फोन, जिनमें दो आईफोन शामिल हैं, एक लैपटॉप, 29 एटीएम कार्ड, 13 बैंक पासबुक और कई डिजिटल उपकरण बरामद किए गए हैं।
जांच एजेंसियों का कहना है कि यह नेटवर्क पाकिस्तान में बैठे हैंडलर के निर्देशों पर काम कर रहा था, जो भारत में सक्रिय सहयोगियों के माध्यम से पैसे का लेनदेन कराता था। आरोपी पहले आसपास के मजदूरों को निशाना बनाता था और फिर उनके खातों को ठगी के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि इस तरह के मामलों में सोशल इंजीनियरिंग और बैंकिंग सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाया जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि “क्रिप्टो और म्यूल अकाउंट नेटवर्क का यह मिश्रण आज के समय में सबसे तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों में से एक है, जिसमें आम लोग अनजाने में भी शिकार बन सकते हैं।”
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अधिकारियों ने बताया कि पूरे नेटवर्क में 50 से अधिक बैंक खातों का इस्तेमाल हुआ है और सभी ट्रांजैक्शन यूपीआई और नकद जमा के जरिए किए गए थे। जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी अलग-अलग डिजिटल वॉलेट के जरिए पैसों को घुमाकर ट्रैकिंग से बचने की कोशिश कर रहे थे।
फिलहाल मामले की जांच जारी है और एजेंसियां इस नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय लिंक और अन्य संभावित सहयोगियों की पहचान करने में जुटी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के संगठित साइबर अपराधों पर नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सख्त निगरानी जरूरी है।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत में म्यूल बैंक अकाउंट नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय हैंडलर्स से जुड़े साइबर फ्रॉड मामलों में तेजी आई है। अपराधी कमजोर आर्थिक वर्ग के लोगों को निशाना बनाकर उनके बैंक खातों को किराए पर लेते हैं और फिर उन खातों का उपयोग ऑनलाइन ठगी, फर्जी निवेश स्कीम, फिशिंग लिंक और डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों में करते हैं।
इस तरह के नेटवर्क की खास बात यह होती है कि इसमें पैसा कई लेयर में ट्रांसफर किया जाता है, जिससे जांच एजेंसियों के लिए असली स्रोत तक पहुंचना बेहद कठिन हो जाता है।क्रिप्टोकरेंसी और यूपीआई जैसे डिजिटल माध्यमों के उपयोग ने इस तरह के अपराधों को और अधिक जटिल बना दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते बैंकिंग सिस्टम में केवाईसी और ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग को और मजबूत नहीं किया गया, तो ऐसे नेटवर्क भविष्य में और बड़े वित्तीय नुकसान का कारण बन सकते हैं। इसके अलावा जागरूकता की कमी भी एक बड़ा कारण है, क्योंकि कई लोग थोड़े से कमीशन के लालच में अपने बैंक खाते और पहचान दस्तावेज दूसरों को दे देते हैं, जिसका इस्तेमाल बड़े साइबर सिंडिकेट द्वारा किया जाता है।
इस मामले ने एक बार फिर यह साबित किया है कि डिजिटल वित्तीय सुरक्षा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है, जिसमें हर व्यक्ति की सतर्कता आवश्यक है।
