70 वर्षीय पूर्व अधिकारी से ₹2.5 करोड़ की ठगी के मामले में चिंता, अंतर-विभागीय टास्क फोर्स को मजबूत ढांचा तैयार करने के निर्देश

डिजिटल अरेस्ट स्कैम बना राष्ट्रीय चुनौती: सुप्रीम कोर्ट ने मांगी सख्त कार्ययोजना

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By Roopa
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नई दिल्ली। देश में तेजी से बढ़ रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि बार-बार चेतावनियों के बावजूद पढ़े-लिखे लोग और वरिष्ठ नागरिक भी इस तरह के संगठित साइबर ठगी नेटवर्क का शिकार हो रहे हैं और अपनी जीवनभर की कमाई गंवा रहे हैं।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया कि डिजिटल अरेस्ट मामलों से निपटने के लिए गठित अंतर-विभागीय टास्क फोर्स को एक मजबूत और प्रभावी प्रणाली तैयार करने के लिए तीन और सप्ताह का समय चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है और तत्काल ठोस कदम उठाना जरूरी है।

अदालत में एक ताजा मामला भी सामने रखा गया, जिसमें चंडीगढ़ के 70 वर्षीय पूर्व वरिष्ठ अधिकारी से करीब ₹2.5 करोड़ की ठगी की गई। पीड़ित को लगभग 27 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट जैसी स्थिति में रखकर मानसिक दबाव बनाया गया और अलग-अलग बहानों से उनसे रकम ट्रांसफर करवाई गई। बाद में इस मामले में सात आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जो इस पूरे साइबर गिरोह से जुड़े बताए जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट स्कैम अब एक संगठित साइबर नेटवर्क का हिस्सा बन चुका है, जिसमें अपराधी फोन कॉल, वीडियो कॉल और फर्जी सरकारी पहचान का इस्तेमाल कर लोगों को डराते हैं और उन्हें तत्काल कार्रवाई का भय दिखाकर पैसे ऐंठते हैं। अदालत ने इस पर रोक लगाने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर सख्त सुधार की आवश्यकता बताई।

सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि एक राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर और समर्पित शिकायत प्रणाली तैयार करने की योजना पर काम चल रहा है, ताकि ऐसे मामलों में पीड़ित तुरंत शिकायत दर्ज कर सकें और कार्रवाई शुरू हो सके। इसके तहत एक केंद्रीकृत संपर्क प्रणाली बनाने पर भी विचार किया जा रहा है।

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सुनवाई में यह भी सामने आया कि साइबर अपराधी अब केवल तकनीकी तरीके ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे खुद को पुलिस, सीबीआई या न्यायिक अधिकारी बताकर लोगों को भ्रमित करते हैं और उन्हें जांच के नाम पर नियंत्रण में ले लेते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट स्कैम में पहले व्यक्ति की निजी जानकारी जुटाई जाती है और फिर उसे कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर मानसिक रूप से प्रभावित किया जाता है। इसके बाद अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं, जिन्हें ट्रेस करना बेहद मुश्किल होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद ऐसे मामलों में लोग लगातार फंस रहे हैं, जो एक गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने माना कि कई पीड़ितों को यह समझने में देर हो जाती है कि वे किसी वास्तविक जांच का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साइबर धोखाधड़ी का हिस्सा बन चुके हैं।

इस मामले में केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि टास्क फोर्स अगली सुनवाई में एक ठोस और प्रभावी कार्ययोजना प्रस्तुत करे, ताकि डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों पर नियंत्रण लगाया जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे डिजिटल लेनदेन और ऑनलाइन सेवाएं बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे साइबर अपराधों के तरीके भी अधिक जटिल और खतरनाक होते जा रहे हैं। ऐसे में तकनीकी सुरक्षा के साथ-साथ नागरिकों की निरंतर जागरूकता बेहद जरूरी है।

फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है और आने वाले समय में डिजिटल अरेस्ट स्कैम के खिलाफ एक सख्त राष्ट्रीय ढांचा तैयार होने की उम्मीद जताई जा रही है।

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