वॉशिंगटन/डबलिन (कैलिफोर्निया)। अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करने वाले एक बड़े मामले में भारतीय मूल के दो व्यक्तियों ने फर्जी H-1B वीज़ा स्कीम चलाने का अपराध स्वीकार कर लिया है। यह मामला दर्शाता है कि किस तरह वर्षों तक सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर फर्जी जॉब ऑफर के जरिए वर्क वीज़ा हासिल किए गए।
आरोपियों की पहचान संपत राजिडी और श्रीधर माडा (दोनों उम्र 51 वर्ष) के रूप में हुई है, जो कैलिफोर्निया के डबलिन के निवासी हैं। दोनों ने वीज़ा फ्रॉड की साजिश रचने का दोष स्वीकार किया है। अमेरिकी अभियोजकों के अनुसार, आरोपियों ने कई H-1B वीज़ा आवेदन ऐसे पदों के लिए दाखिल किए जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थे, और दावा किया कि विदेशी कर्मचारियों को एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में नियुक्त किया जाएगा।
जांच में सामने आया कि राजिडी वीज़ा सर्विसिंग कंपनियां—S-Team Software Inc और Uptrend Technologies LLC—चलाता था, जो विदेशी पेशेवरों को अस्थायी नौकरी दिलाने का दावा करती थीं। लेकिन वास्तविकता में इन कंपनियों का मुख्य उद्देश्य फर्जी जॉब ऑफर के जरिए H-1B वीज़ा हासिल करना था। वहीं माडा, जो यूनिवर्सिटी से जुड़े एक विभाग में वरिष्ठ तकनीकी पद पर कार्यरत था, ने अपनी स्थिति का इस्तेमाल इन फर्जी आवेदनों को विश्वसनीय बनाने में किया।
FCRF Launches India’s Premier Certified Data Protection Officer Program Aligned with DPDP Act
जून 2020 से जनवरी 2023 के बीच आरोपियों ने सुनियोजित तरीके से गलत जानकारी के साथ वीज़ा आवेदन दाखिल किए। अभियोजन पक्ष के अनुसार, माडा की यूनिवर्सिटी से जुड़ी पहचान ने इन आवेदनों को “इनसाइड एडवांटेज” दिया, जिससे उनके मंजूर होने की संभावना बढ़ गई। वीज़ा मिलने के बाद कर्मचारियों को यूनिवर्सिटी में नियुक्त करने के बजाय निजी कंपनियों में भेज दिया जाता था, जिससे यह पूरा सिस्टम अवैध श्रम आपूर्ति के माध्यम में बदल गया।
अधिकारियों का कहना है कि इस धोखाधड़ी से न केवल अवैध आर्थिक लाभ कमाया गया, बल्कि H-1B वीज़ा आवंटन प्रणाली की निष्पक्षता भी प्रभावित हुई। फर्जी आवेदनों के कारण वास्तविक कंपनियों और योग्य उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध वीज़ा स्लॉट कम हो गए, जिससे प्रतिस्पर्धा का संतुलन बिगड़ गया।
यह मामला बहु-एजेंसी जांच के बाद सामने आया, जिसमें अमेरिकी सुरक्षा और इमिग्रेशन से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों ने भाग लिया। जांच के दौरान फर्जी दस्तावेज, भ्रामक रोजगार रिकॉर्ड और आंतरिक संचार जैसे कई महत्वपूर्ण सबूत मिले, जो यह साबित करते हैं कि आरोपी पहले से जानते थे कि उनके दावे झूठे हैं।
अभियोजन पक्ष ने स्पष्ट किया कि आरोपियों को यह भली-भांति पता था कि वीज़ा आवेदन में दी गई जानकारी निर्णय प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाती है। इसके बावजूद उन्होंने झूठे दावे कर सिस्टम का दुरुपयोग किया। अमेरिकी न्याय विभाग ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां न केवल कानून का उल्लंघन हैं, बल्कि इमिग्रेशन सिस्टम में भरोसे को भी कमजोर करती हैं।
दोनों आरोपियों को अब अधिकतम पांच साल की सजा और लगभग ₹2.1 करोड़ (प्रत्येक) तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। उनकी सजा पर अंतिम फैसला 30 जुलाई 2026 को अमेरिकी अदालत में सुनाया जाएगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भविष्य में वीज़ा फ्रॉड के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आधार बन सकता है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका में H-1B वीज़ा कार्यक्रम पहले से ही सख्त निगरानी के दायरे में है। नीति-निर्माताओं ने फर्जी आवेदनों, स्टाफिंग कंपनियों द्वारा दुरुपयोग और अनुपालन की कमी को लेकर चिंता जताई है। इस घटना के बाद और कड़े सत्यापन और निगरानी की संभावना बढ़ गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला संगठित व्हाइट-कॉलर अपराध का उदाहरण है, जिसमें संस्थागत विश्वसनीयता का फायदा उठाकर अवैध लाभ कमाया गया। वैध संस्थानों के नाम का इस्तेमाल कर वीज़ा मंजूरी हासिल करना वैश्विक स्तर पर बढ़ती प्रवृत्ति बन चुकी है।
जांच एजेंसियां अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य संभावित लोगों और लाभार्थियों की पहचान करने में जुटी हैं। साथ ही वित्तीय लेनदेन की जांच, रोजगार दावों की पुष्टि और पूरी साजिश की परतें खोलने का प्रयास जारी है।
जैसे-जैसे मामला सजा की ओर बढ़ रहा है, यह स्पष्ट हो गया है कि वीज़ा प्रक्रिया में कड़े सत्यापन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद जरूरी है, ताकि इस तरह के जटिल और संगठित धोखाधड़ी नेटवर्क पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सके।
