अहमदाबाद। गुजरात के भावनगर स्थित एक सहकारी बैंक में सॉफ्टवेयर की गंभीर खामी का फायदा उठाकर ₹7.34 करोड़ की हाई-टेक साइबर ठगी का मामला सामने आया है। जांच में खुलासा हुआ है कि आरोपियों ने बैंक के कोर सिस्टम में मौजूद तकनीकी कमजोरी का इस्तेमाल करते हुए डॉर्मेंट खातों को निशाना बनाया, उनमें फर्जी बैलेंस तैयार किया और फिर रकम को तेजी से अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिया। इस मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें तीन अहमदाबाद और एक मुंबई का निवासी है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों में अदनान शेख (24), रूबीना शेख (31), सुशील कुमार मेघवाल (32) और किशोर परदेशी (43) शामिल हैं। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि यह गिरोह संगठित तरीके से काम करता था और बैंकिंग सिस्टम की तकनीकी खामियों को पहचानकर बड़े पैमाने पर ठगी को अंजाम देता था। एजेंसियों को इस नेटवर्क के कई राज्यों में फैले होने के संकेत मिले हैं।
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जांच के दौरान यह सामने आया कि आरोपियों ने बैंक के उन खातों को निशाना बनाया, जो लंबे समय से निष्क्रिय पड़े थे। सबसे पहले इन खातों से जुड़े मोबाइल नंबर बदलकर अपने नियंत्रण में लिए गए, जिससे खाते पर पूरी तरह कब्जा हो गया। इसके बाद सिस्टम में हेरफेर कर करीब ₹7.35 करोड़ का फर्जी बैलेंस तैयार किया गया, जो वास्तविक ठगी की राशि के लगभग बराबर है।
इसके बाद आरोपियों ने इस रकम को 135 अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया। इस प्रक्रिया में ‘लेयरिंग’ तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिससे पैसों के स्रोत को छिपाया जा सके और जांच एजेंसियों के लिए ट्रेल पकड़ना मुश्किल हो जाए। अधिकारियों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में खातों का उपयोग यह दिखाता है कि यह ठगी किसी एक व्यक्ति का काम नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क की सुनियोजित साजिश है।
जांच एजेंसी को आरोपियों के पास से मिले मोबाइल फोन और डिजिटल डिवाइस की जांच में 42 और बैंक खातों की जानकारी मिली है, जिनका इस्तेमाल इस नेटवर्क में किया गया। राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल के जरिए की गई पड़ताल में यह भी सामने आया है कि यह गिरोह देशभर में 15 से अधिक साइबर ठगी के मामलों से जुड़ा हो सकता है, जिनमें करीब ₹4 करोड़ की अतिरिक्त ठगी का अनुमान है।
इन मामलों का दायरा कई राज्यों तक फैला हुआ है, जिनमें कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब और महाराष्ट्र शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था और विभिन्न राज्यों में अलग-अलग तरीकों से साइबर अपराध को अंजाम दे रहा था।
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि आरोपी ‘म्यूल अकाउंट’ का इस्तेमाल करते थे। इसके तहत वे लोगों को पैसे का लालच देकर उनके बैंक खाते, एटीएम कार्ड, चेकबुक और सिम कार्ड किराए पर लेते थे। इन खातों के जरिए ठगी की रकम को तेजी से इधर-उधर ट्रांसफर किया जाता था, जिससे असली आरोपियों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता था।
अब तक जांच एजेंसियों ने करीब ₹2.04 करोड़ की राशि को फ्रीज कर लिया है, जबकि बाकी रकम की ट्रेल को खंगालने का काम जारी है। अधिकारियों का मानना है कि बैंकिंग सिस्टम में जिस तरह की तकनीकी खामी का फायदा उठाया गया, वह देश के अन्य 14–15 बैंकों में भी मौजूद हो सकती है। इस पहलू को ध्यान में रखते हुए व्यापक स्तर पर जांच शुरू कर दी गई है।
यह मामला सामने आने के बाद बैंकिंग सिस्टम की साइबर सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कोर बैंकिंग सिस्टम में छोटी-सी चूक भी बड़े वित्तीय नुकसान का कारण बन सकती है, यदि समय रहते उसे सुधारा न जाए।
अधिकारियों ने आम लोगों को भी सतर्क रहने की सलाह दी है। विशेष रूप से अपने बैंक खाते, एटीएम कार्ड, चेकबुक या सिम कार्ड किसी भी व्यक्ति को किराए पर देने से बचने को कहा गया है। साथ ही, किसी भी साइबर ठगी की स्थिति में तुरंत हेल्पलाइन नंबर 1930 पर सूचना देने की अपील की गई है, क्योंकि शुरुआती समय में शिकायत दर्ज कराने से रकम की रिकवरी की संभावना काफी बढ़ जाती है।
