हैदराबाद। देश में तेजी से बढ़ते “डिजिटल अरेस्ट” साइबर फ्रॉड का एक और मामला सामने आया है, जिसमें साइबर जालसाजों ने खुद को मुंबई पुलिस और सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर एक 66 वर्षीय रिटायर्ड रेल कर्मचारी से करीब ₹4 लाख की ठगी कर ली।
पीड़ित, जो पीरजादिगुड़ा क्षेत्र के निवासी हैं, को 7 अप्रैल को एक कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को “डाटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया” का अधिकारी राहुल शर्मा बताया। उसने दावा किया कि पीड़ित के आधार से जारी एक सिम कार्ड का इस्तेमाल आपराधिक गतिविधियों में किया गया है।
इसके बाद आरोपी ने कॉल को एक अन्य व्यक्ति से जोड़ दिया, जिसने खुद को मुंबई के कोलाबा पुलिस स्टेशन का सब-इंस्पेक्टर “संदीप राव” बताया। इस दौरान पीड़ित को बताया गया कि उसके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज है और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट तैयार कर लिया है।
जालसाजों ने लगातार दबाव बनाते हुए पीड़ित को डराया और कहा कि जांच के लिए बैंक खाते की “वेरिफिकेशन प्रक्रिया” जरूरी है। इसी बहाने 8 अप्रैल को पीड़ित से उसके बैंक खाते से ₹4 लाख ट्रांसफर करवा लिए गए। आरोपियों ने उसे ईडी और आरबीआई के फर्जी दस्तावेज भी भेजे, ताकि पूरा मामला आधिकारिक लगे।
पुलिस जांच के अनुसार, ठगों ने धीरे-धीरे मानसिक दबाव बनाते हुए और रकम की मांग शुरू कर दी थी। यहां तक कि उन्होंने सोने के गहने गिरवी रखने के लिए भी दबाव बनाया। इसी बीच पीड़ित को शक हुआ और उसने 15 अप्रैल को अपने परिवार से बात की।
परिजनों ने तुरंत उसे बताया कि यह पूरी तरह साइबर ठगी है। इसके बाद 16 अप्रैल को पीड़ित ने मलकाजगिरी साइबरक्राइम पुलिस से संपर्क कर शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट की धाराओं 66C और 66D के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
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जांच अधिकारियों के अनुसार, यह मामला “डिजिटल अरेस्ट स्कैम” के बढ़ते ट्रेंड का हिस्सा है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को मानसिक रूप से डराते हैं और पैसे वसूलते हैं।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के मामलों में पीड़ित को लगातार वीडियो या ऑडियो कॉल पर “अंडर डिजिटल कस्टडी” होने का भ्रम दिया जाता है, ताकि वह किसी से संपर्क न कर सके और दबाव में आकर पैसे ट्रांसफर कर दे।
इस मामले पर साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा कि ऐसे अपराधी “सोशल इंजीनियरिंग और भय आधारित मनोवैज्ञानिक दबाव” का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि “डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं होती, लेकिन अपराधी नकली आदेश, फर्जी वारंट और सरकारी लोगो का इस्तेमाल कर लोगों को भ्रमित करते हैं।”
पुलिस ने बताया कि इस गिरोह द्वारा भेजे गए ईडी और आरबीआई के दस्तावेज पूरी तरह फर्जी पाए गए हैं। प्रारंभिक जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि यह नेटवर्क देशभर में सक्रिय हो सकता है और कई राज्यों में इसी तरह की ठगी की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल पर डरें नहीं और न ही किसी को बैंक विवरण या पैसे ट्रांसफर करें। सरकारी एजेंसियां कभी भी इस तरह फोन पर “डिजिटल अरेस्ट” या तत्काल भुगतान की मांग नहीं करतीं।
फिलहाल पुलिस साइबर नेटवर्क की ट्रेसिंग कर रही है और कॉल डिटेल, बैंक ट्रांजैक्शन तथा डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर आरोपियों की पहचान की जा रही है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह एक संगठित अंतरराज्यीय साइबर फ्रॉड रैकेट हो सकता है, जिसके तार कई अन्य मामलों से जुड़े हो सकते हैं।
