लखनऊ। साइबर अपराधियों ने एक बार फिर डिजिटल ठगी का भयावह चेहरा दिखाते हुए कैंसर पीड़ित बुजुर्ग और एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी को निशाना बनाया। खुद को एटीएस और एनआईए का अधिकारी बताकर जालसाजों ने दोनों मामलों में टेरर फंडिंग और देशद्रोह में फंसाने की धमकी दी और वीडियो कॉल के जरिए लंबे समय तक मानसिक दबाव बनाकर करोड़ों रुपये ठग लिए।
पहले मामले में 76 वर्षीय दिलीप नारायण पांडेय और उनकी पत्नी को करीब 15 दिनों तक “डिजिटल अरेस्ट” में रखकर सवा करोड़ रुपये की ठगी की गई, जबकि दूसरे मामले में सेना से रिटायर्ड नायब सूबेदार को चार दिनों तक डराकर 95 लाख रुपये हड़प लिए गए।
पीड़ित परिवार के अनुसार यह पूरा खेल 27 मार्च की रात शुरू हुआ, जब महिला के मोबाइल पर एक कॉल आई। कॉल करने वाले ने खुद को सुरक्षा एजेंसी का अधिकारी बताया और दावा किया कि मुंबई में आतंकियों की गिरफ्तारी के बाद टेरर फंडिंग की जांच में उनके बैंक खातों का नाम सामने आया है। इसके बाद लगातार वीडियो कॉल के जरिए परिवार पर निगरानी रखी गई और किसी से संपर्क न करने का दबाव बनाया गया।
जालसाजों ने डर का माहौल बनाते हुए कहा कि यदि सहयोग नहीं किया गया तो तुरंत गिरफ्तारी होगी और देशद्रोह के मामले में जेल भेज दिया जाएगा। इसी दबाव में पीड़ितों ने 10 अप्रैल तक विभिन्न बैंक खातों में कुल 1.29 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दिए। बताया गया कि इलाज के लिए रखी गई पूरी जमा पूंजी भी इसी ठगी में खत्म हो गई।
दूसरे मामले में रिटायर्ड नायब सूबेदार को भी चार दिनों तक लगातार डिजिटल अरेस्ट में रखा गया। उनसे बैंक खातों की डिटेल लेकर यह धमकी दी गई कि यदि पैसे ट्रांसफर नहीं किए गए तो उन्हें आतंकवादी गतिविधियों से जोड़ दिया जाएगा। इस तरह उनसे 95 लाख रुपये ठग लिए गए।
साइबर अपराध का यह तरीका पूरी तरह सुनियोजित और मनोवैज्ञानिक दबाव पर आधारित है, जिसमें फर्जी पहचान, वीडियो कॉल निगरानी और तत्काल गिरफ्तारी का डर दिखाकर पीड़ितों को नियंत्रित किया जाता है।
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साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “ऐसे मामलों में अपराधी सरकारी एजेंसियों का नाम लेकर लोगों के मन में भय पैदा करते हैं और उन्हें सोचने-समझने का समय नहीं देते। यह पूरी तरह मनोवैज्ञानिक नियंत्रण और डिजिटल दुरुपयोग का मामला है, जिसमें लोग बिना सत्यापन के पैसे ट्रांसफर कर देते हैं।”
पीड़ितों का कहना है कि उन्हें लगातार कहा गया कि उनके खातों की जांच चल रही है और हर गतिविधि रिकॉर्ड की जा रही है। इलाज के लिए रखे गए पैसों तक को ठगों ने अपने खातों में ट्रांसफर करा लिया।
ठगी का यह तरीका अब तेजी से फैल रहा है, जिसमें फर्जी कॉल सेंटर और संगठित नेटवर्क की भूमिका होने की आशंका जताई जा रही है। पहले डर पैदा किया जाता है, फिर तुरंत कार्रवाई के नाम पर बैंक ट्रांसफर कराए जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अनजान कॉल, वीडियो कॉल या सरकारी जांच के नाम पर मांगे गए पैसों को बिना पुष्टि के कभी ट्रांसफर नहीं करना चाहिए। किसी भी संदिग्ध स्थिति में तुरंत साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत करना जरूरी है।
लगातार बढ़ते ऐसे मामलों ने शहर में चिंता बढ़ा दी है, खासकर बुजुर्ग और गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोग इनका आसान निशाना बन रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में संगठित गिरोह सक्रिय हैं, जो तकनीक का दुरुपयोग कर लोगों को आर्थिक नुकसान पहुंचा रहे हैं।
फिलहाल जांच एजेंसियां इस नेटवर्क की पड़ताल में जुटी हैं और ठगे गए पैसों में से कुछ रकम को आंशिक रूप से फ्रीज किए जाने की जानकारी सामने आई है। साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे नेटवर्क को खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जागरूकता सबसे जरूरी कदम है।
फिलहाल सतर्कता जरूरी
