फर्जी बिजली बिल मैसेज और ऐप डाउनलोड के जरिए ₹1.99 लाख की साइबर ठगी पर उपभोक्ता आयोग ने SBI को रकम लौटाने का आदेश दिया

फर्जी बिजली मैसेज बना जाल: ऐप डाउनलोड करते ही खाते से उड़े ₹1.99 लाख

Team The420
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नई दिल्ली। डिजिटल बैंकिंग फ्रॉड के मामलों में उपभोक्ताओं के अधिकारों को मजबूत करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम फैसले में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को निर्देश दिया है कि वह साइबर ठगी के शिकार एक ग्राहक को ₹1.99 लाख की पूरी राशि लौटाए। इसके साथ ही आयोग ने ₹25,000 मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। आयोग ने साफ किया कि यदि ग्राहक समय पर अनधिकृत लेन-देन की सूचना देता है, तो बैंक अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

यह मामला जुलाई 2022 का है, जब बेंगलुरु के एक निवासी को बिजली बिल बकाया होने और कनेक्शन काटने की चेतावनी वाला एक फर्जी SMS मिला। संदेश में दिए गए नंबर पर संपर्क करने पर उसे एक मोबाइल एप्लिकेशन डाउनलोड करने के लिए कहा गया, जो देखने में बिजली विभाग के आधिकारिक प्लेटफॉर्म जैसा प्रतीत हो रहा था। इसके बाद उसे मात्र ₹20 का भुगतान कर बकाया बिल चुकाने के लिए कहा गया।

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लेकिन जैसे ही उसने भुगतान की प्रक्रिया पूरी की, उसके खाते से ₹25,000 कटने का अलर्ट आया और उसके तुरंत बाद ₹1.99 लाख की एक और अनधिकृत निकासी हो गई। उल्लेखनीय है कि इन ट्रांजैक्शनों के लिए किसी OTP साझा किए जाने का कोई प्रमाण सामने नहीं आया। इसके बाद पीड़ित का मोबाइल फोन भी अचानक काम करना बंद कर गया, जिससे यह आशंका और गहरी हो गई कि फोन में मालवेयर या रिमोट एक्सेस के जरिए ठगी को अंजाम दिया गया।

ठगी का एहसास होते ही पीड़ित ने तुरंत साइबर क्राइम पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और उसी दिन SBI को भी हेल्पलाइन व ईमेल के माध्यम से सूचित किया। बैंक ने ₹25,000 की राशि वापस कर दी और खाते को फ्रीज कर दिया, लेकिन ₹1.99 लाख की बड़ी रकम को वापस करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जिसके बाद मामला कानूनी प्रक्रिया में पहुंच गया।

शुरुआत में जिला उपभोक्ता फोरम ने शिकायत को खारिज करते हुए ग्राहक की संभावित लापरवाही का हवाला दिया। हालांकि, मई 2025 में कर्नाटक राज्य उपभोक्ता आयोग ने इस फैसले को पलटते हुए SBI को पूरी राशि लौटाने और ₹25,000 मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके खिलाफ SBI ने राष्ट्रीय आयोग में अपील की, जहां उसने तर्क दिया कि बिना OTP साझा किए इस तरह की ठगी संभव नहीं है और ग्राहक ने सूचना देने में देरी की।

राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि पीड़ित ने समय पर बैंक को सूचना दी थी और बैंक ग्राहक की किसी भी प्रकार की लापरवाही साबित करने में असफल रहा। आयोग ने यह भी कहा कि केवल किसी फर्जी ऐप को डाउनलोड करना अपने आप में लापरवाही नहीं माना जा सकता, जब तक कि संवेदनशील जानकारी साझा करने के ठोस प्रमाण न हों।

फैसले में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 6 जुलाई 2017 के दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया गया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि किसी तीसरे पक्ष की वजह से अनधिकृत लेन-देन होता है और ग्राहक तीन कार्यदिवस के भीतर इसकी सूचना देता है, तो उसकी “जीरो लायबिलिटी” होगी। आयोग ने कहा कि ऐसे मामलों में बैंक की जिम्मेदारी बनती है कि वह तुरंत प्रभावी कार्रवाई करे और नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करे।

आयोग ने यह भी माना कि SBI द्वारा ₹25,000 की राशि वापस करना इस बात का संकेत है कि सूचना समय पर प्राप्त हुई थी। इसके बावजूद बड़ी रकम को वापस न करना बैंक की लापरवाही को दर्शाता है। इस आधार पर आयोग ने बैंक को पूरी राशि लौटाने का निर्देश दिया।

अंतिम आदेश के तहत SBI को चार सप्ताह के भीतर ₹1,99,000 लौटाने और ₹25,000 मुआवजा देने को कहा गया है। यदि तय समयसीमा में भुगतान नहीं किया गया, तो बैंक को 8% वार्षिक ब्याज के साथ राशि चुकानी होगी।

यह फैसला डिजिटल युग में तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराधों के बीच उपभोक्ता संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि बैंकिंग संस्थानों को ग्राहकों की सुरक्षा के प्रति अधिक जवाबदेह होना होगा और बिना ठोस साक्ष्य के जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।

बढ़ते साइबर फ्रॉड के दौर में यह फैसला यह भी रेखांकित करता है कि समय पर शिकायत दर्ज कराना बेहद जरूरी है, ताकि उपभोक्ताओं को नियामकीय सुरक्षा मिल सके और वित्तीय नुकसान की भरपाई संभव हो सके।

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