मेरठ में फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज और सिमबॉक्स नेटवर्क के जरिए 50 मामलों में ₹2.70 करोड़ की डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का खुलासा

फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज से चला ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खेल: देशभर में 50 केस, साइबर ठगों ने उड़ाए ₹2.70 करोड़

Team The420
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मेरठ। फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज और सिमबॉक्स नेटवर्क के जरिए देशभर में साइबर ठगी और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे अपराधों को अंजाम देने वाले एक संगठित गिरोह का बड़ा खुलासा हुआ है। पुलिस और एटीएस की संयुक्त जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क के जरिए 50 से अधिक मामलों में करीब ₹2.70 करोड़ की ठगी की गई है।

जांच अधिकारियों के अनुसार, हाल ही में मेरठ के लिसाड़ी गेट क्षेत्र में छापेमारी के दौरान एक फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज का भंडाफोड़ किया गया था। मौके से भारी मात्रा में सिमबॉक्स डिवाइस, फर्जी आईडी पर जारी सिम कार्ड और अन्य तकनीकी उपकरण बरामद किए गए थे। इसी आधार पर आगे की जांच शुरू की गई, जिसने पूरे नेटवर्क की परतें खोल दीं।

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एनसीआरपी (National Cyber Crime Reporting Portal) और समन्वय पोर्टल के जरिए जुटाए गए डेटा के विश्लेषण में पता चला कि इस सिस्टम का इस्तेमाल केवल कॉल रूटिंग के लिए नहीं, बल्कि सुनियोजित साइबर अपराधों के लिए किया जा रहा था। आरोपियों ने अपनी असली पहचान छिपाकर देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों को निशाना बनाया।

पुलिस के अनुसार, यह गिरोह खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ितों को फोन करता था और उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाता था। इसके बाद लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे किसी गंभीर मामले में फंसे हैं और जांच के नाम पर उनसे बैंक खातों की जानकारी और पैसे ट्रांसफर करवाए जाते थे।

जांच में यह भी सामने आया है कि फर्जी टेलीफोन एक्सचेंज में इस्तेमाल किए जा रहे सिमबॉक्स सिस्टम के जरिए विदेशी और घरेलू कॉल्स को रूट किया जाता था, जिससे असली लोकेशन और कॉलिंग सोर्स का पता लगाना मुश्किल हो जाता था। इसी तकनीकी छिपाव का फायदा उठाकर गिरोह लंबे समय से सक्रिय था।

इस मामले पर साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रोफेसर Triveni Singh ने कहा कि ऐसे नेटवर्क अब अत्यधिक संगठित और तकनीक-आधारित हो चुके हैं। उनके अनुसार, “डिजिटल अरेस्ट जैसे फ्रॉड में अपराधी मनोवैज्ञानिक दबाव, तकनीकी स्पूफिंग और संस्थागत डर का एक साथ इस्तेमाल करते हैं। सिमबॉक्स और वर्चुअल टेलीफोन एक्सचेंज इस पूरे फ्रॉड को लगभग ट्रेस-लेस बना देते हैं।”

अधिकारियों का कहना है कि बरामद डिवाइसों और डिजिटल डेटा की जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह नेटवर्क एक संगठित साइबर फ्रॉड सिंडिकेट का हिस्सा है, जो कई राज्यों में फैला हुआ है। इस नेटवर्क में तकनीकी विशेषज्ञों के साथ-साथ फर्जी पहचान तैयार करने वाले लोग भी शामिल थे।

जांच एजेंसियों ने यह भी पाया कि गिरोह के सदस्य फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सिम कार्ड हासिल करते थे और उन्हें सिमबॉक्स डिवाइस में लगाकर एक साथ सैकड़ों कॉल्स को मैनेज करते थे। इससे पीड़ितों को वास्तविक सरकारी या जांच एजेंसी से कॉल आने का भ्रम होता था।

पुलिस ने बताया कि जिन 50 मामलों की पहचान की गई है, वे अलग-अलग राज्यों से जुड़े हुए हैं और सभी में एक समान पैटर्न पाया गया है—पहले डर पैदा करना, फिर डिजिटल निगरानी का झांसा देना और अंत में पैसे ट्रांसफर करवाना।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह नेटवर्क पूरी तरह तकनीक आधारित था और इसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि सामान्य जांच में इसकी पहचान करना बेहद कठिन हो। “हम एनसीआरपी और तकनीकी डेटा की मदद से पूरे नेटवर्क को ट्रेस कर रहे हैं। इसमें कई स्तरों पर लोग शामिल हैं,” अधिकारी ने बताया।

फिलहाल पुलिस और एटीएस की संयुक्त टीमें इस पूरे गिरोह के मास्टरमाइंड और वित्तीय नेटवर्क की जांच में जुटी हैं। आशंका है कि यह सिंडिकेट केवल उत्तर भारत ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों और संभवतः विदेशों तक फैला हुआ है।

इस खुलासे के बाद साइबर सुरक्षा एजेंसियों ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है और कहा है कि किसी भी अज्ञात कॉल पर व्यक्तिगत जानकारी या पैसे साझा न करें, क्योंकि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया अस्तित्व में नहीं है।

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