कानपुर। अवैध किडनी ट्रांसप्लांट नेटवर्क से जुड़े एक बड़े मामले में दिल्ली निवासी ओटी मैनेजर मुदस्सिर अली सिद्दीकी उर्फ डॉ. अली के सरेंडर के साथ जांच में नया मोड़ आ गया है। पुलिस की पकड़ से लंबे समय तक बचता रहा यह आरोपी आखिरकार एसीजेएम कोर्ट में पेश होकर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उस पर आरोप है कि वह इस पूरे रैकेट का एक प्रमुख संचालनकर्ता था और अकेले ही 30 से अधिक अवैध किडनी ट्रांसप्लांट ऑपरेशन में शामिल रहा।
जांच एजेंसियों के अनुसार, यह पूरा नेटवर्क किराए पर लिए गए ऑपरेशन थिएटरों में चलता था, जहां बिना वैध अनुमति और योग्य सर्जनों के गंभीर सर्जरी की जाती थी। पुलिस का दावा है कि आरोपी ने दिल्ली में बाकायदा प्रशिक्षण प्राप्त किया था, जिसके बाद वह इस अवैध गतिविधि से जुड़ गया। हालांकि, वह स्वयं सर्जन नहीं था, लेकिन ऑपरेशन थिएटर में उसकी भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है।
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मामला उस समय सामने आया जब कानपुर के रावतपुर स्थित एक अस्पताल में संदिग्ध किडनी ट्रांसप्लांट की सूचना मिली। जांच के दौरान पुलिस को अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती मरीजों और डोनर की जानकारी मिली, जिससे पूरे नेटवर्क की परतें खुलनी शुरू हुईं। इसके बाद पुलिस ने अब तक 10 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा था, जबकि मुदस्सिर इस मामले में 11वां प्रमुख आरोपी माना जा रहा है।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, यह गिरोह एक संगठित तरीके से काम करता था। मरीजों और डोनरों को अलग-अलग राज्यों से लाया जाता था और उन्हें अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कर ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता था। इस दौरान पहचान छिपाने और रिकॉर्ड से बचने के लिए अस्पतालों और स्टाफ की मिलीभगत का भी संदेह जताया जा रहा है।
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी कभी अकेले कानपुर नहीं आता था। उसके साथ एक डॉक्टर और दो सहायक हमेशा मौजूद रहते थे। ऑपरेशन के बाद टीम तुरंत शहर बदल देती थी ताकि किसी भी तरह का ट्रैक रिकॉर्ड न बने। पुलिस को शक है कि इस पूरे नेटवर्क में कई और सफेदपोश लोग भी शामिल हो सकते हैं, जिनकी भूमिका की जांच जारी है।
आरोपी के वकील के अनुसार, उन्होंने 13 अप्रैल को अदालत में सरेंडर अर्जी दाखिल की थी, जिसके बाद अदालत ने जांच रिपोर्ट मांगी थी। इसके बाद 16 अप्रैल को रिपोर्ट दाखिल की गई और अंततः आरोपी ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया। अदालत ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।
दिलचस्प बात यह रही कि सरेंडर के दौरान आरोपी ने खुद को पूरी तरह छिपाने की कोशिश की। वह जींस-टीशर्ट, कैप और मास्क पहनकर कोर्ट पहुंचा और मीडिया से दूरी बनाए रखी। सुरक्षा कारणों से पुलिस ने उसे तुरंत अपनी हिरासत में लेकर जेल भेज दिया।
पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जनवरी से मार्च के बीच ही कई अवैध ट्रांसप्लांट किए गए, जिनमें से कुछ मामलों में मरीजों की हालत गंभीर भी बताई जा रही है। गाजियाबाद के एक अस्पताल के ओटी मैनेजर ने भी बयान दिया है कि वहां भी इसी नेटवर्क के जरिए कई ऑपरेशन किए गए।
फिलहाल पुलिस अब आरोपी की कस्टडी रिमांड लेने की तैयारी में है, ताकि पूरे नेटवर्क, वित्तीय लेनदेन और इसमें शामिल अन्य लोगों की पहचान की जा सके। अधिकारियों का मानना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़े अंतरराज्यीय अवैध अंग व्यापार गिरोह से जुड़ा हुआ है, जिसकी जड़ें कई शहरों तक फैली हो सकती हैं।
जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस अवैध ट्रांसप्लांट नेटवर्क की परतें खुलती जा रही हैं, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी और अस्पतालों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
