मुजफ्फरपुर में फर्जी ATS कॉल के जरिए 17 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर बुजुर्ग दंपति से ₹19 लाख की साइबर ठगी

एक कॉल, 17 दिन का खौफ और ₹19 लाख की ठगी: डिजिटल अरेस्ट से हिला साइबर सुरक्षा तंत्र

Team The420
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मुजफ्फरपुर। बिहार के मुजफ्फरपुर में साइबर ठगी का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था और आम लोगों की सतर्कता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खुद को एंटी टेररिस्ट स्क्वैड (ATS) का अधिकारी बताकर साइबर अपराधियों ने एक बुजुर्ग दंपति को 17 दिनों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखकर करीब ₹19 लाख की ठगी कर ली। इस दौरान पीड़ित दंपति लगातार मानसिक दबाव में रहे और उन्हें फोन व वीडियो कॉल के जरिए नियंत्रित किया जाता रहा।

पीड़ित रिटायर्ड कर्मचारी हरेंद्र कुमार और उनकी पत्नी कांति देवी ने बताया कि यह पूरा मामला 26 मार्च की शाम शुरू हुआ, जब उनके मोबाइल पर एक WhatsApp कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को ATS अधिकारी बताया और गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके आधार कार्ड से एक सिम कार्ड जारी हुआ है, जिसका इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में किया गया है। इसके साथ ही यह भी दावा किया गया कि उनके नाम पर बैंक खाता खोलकर संदिग्ध वित्तीय लेनदेन किए गए हैं।

इन आरोपों के बाद दंपति को गिरफ्तारी का डर दिखाया गया और कहा गया कि वे एक गंभीर राष्ट्रीय जांच के दायरे में हैं। धीरे-धीरे उन्हें यह विश्वास दिला दिया गया कि जब तक जांच पूरी नहीं होती, उन्हें “डिजिटल निगरानी” में रहना होगा। यहीं से शुरू हुआ 17 दिनों तक चलने वाला मानसिक उत्पीड़न का सिलसिला।

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पीड़ित के अनुसार, साइबर ठगों ने उन्हें लगभग लगातार फोन और वीडियो कॉल पर बनाए रखा। दिन-रात उन पर नजर रखी जाती थी और उन्हें केवल बहुत सीमित समय के लिए ही आराम दिया जाता था। कई बार उन्हें 24 घंटे तक कॉल पर रहने के लिए मजबूर किया गया, जिससे उनकी नींद और सामान्य जीवन पूरी तरह प्रभावित हो गया। किसी भी बाहरी व्यक्ति से बातचीत करने पर भी रोक लगा दी गई थी।

ठगों ने डर और भ्रम की स्थिति का पूरा फायदा उठाया। पहले पीड़ित से एक ‘माफी आवेदन’ लिखवाया गया, जिसमें जांच में सहयोग करने और राहत देने की गुहार लगाई गई। इसके बाद कहा गया कि रिजर्व बैंक के निर्देशों के तहत सत्यापन प्रक्रिया के लिए धनराशि जमा करनी होगी। इसी दबाव में आकर पीड़ित ने अलग-अलग बैंक खातों में आरटीजीएस के जरिए रकम ट्रांसफर करना शुरू कर दिया।

30 मार्च को केरल के कोच्चि स्थित एक खाते में ₹5.60 लाख भेजे गए। इसके बाद 2 अप्रैल को मुंबई और कर्नाटक के अलग-अलग खातों में ₹7.10 लाख और ₹6.15 लाख ट्रांसफर किए गए। कुल मिलाकर ₹18.85 लाख की रकम ठगों के खातों में चली गई।

जब ठगों ने इसके बाद भी और पैसे की मांग जारी रखी, तब जाकर पीड़ित को संदेह हुआ। उन्हें एहसास हुआ कि वे एक सुनियोजित साइबर फ्रॉड का शिकार हो चुके हैं। इसके बाद उन्होंने कॉल काटकर अपने परिजनों से संपर्क किया और राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई।

घटना के बाद परिवार ने पीड़ित दंपति को मानसिक रूप से संभाला। परिजनों ने बताया कि लंबे समय तक चले इस डर और दबाव के कारण वे बेहद तनाव में आ गए थे और परिवार को इस बात की चिंता थी कि कहीं वे कोई गलत कदम न उठा लें।

पीड़ित ने बताया कि ठगों के पास केवल उनका ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार का विवरण मौजूद था, जिससे उनका डर और भी बढ़ गया था। लगातार धमकी और गिरफ्तारी के भय ने उन्हें पूरी तरह मानसिक रूप से तोड़ दिया।

मामले की शिकायत के बाद जांच शुरू कर दी गई है। प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि ठगी के लिए फर्जी कंपनियों के नाम पर खोले गए बैंक खातों यानी म्यूल अकाउंट्स का इस्तेमाल किया गया है। संबंधित खातों और ट्रांजैक्शन नेटवर्क की गहन जांच की जा रही है।

साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि “डिजिटल अरेस्ट” जैसी तकनीक अब ठगों का नया हथियार बन चुकी है, जिसमें कानून प्रवर्तन एजेंसियों का नाम लेकर लोगों को मानसिक रूप से बंधक बना लिया जाता है। डर, भ्रम और लगातार निगरानी का माहौल बनाकर पीड़ितों से आसानी से पैसे वसूले जाते हैं।

यह मामला एक बार फिर चेतावनी देता है कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि पूरी तरह मनोवैज्ञानिक युद्ध का रूप ले चुका है, जिसमें जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।

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