पीलीभीत शिक्षा विभाग घोटाले में 53 बैंक खातों के जरिए ₹5 करोड़ की कथित हेराफेरी का आरोपी बना DIOS कार्यालय का चपरासी

53 खातों का जाल, ₹5 करोड़ का खेल: पीलीभीत में चपरासी ने बनाया फर्जीवाड़े का साम्राज्य

Team The420
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पीलीभीत। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में शिक्षा विभाग से जुड़ा एक बड़ा वित्तीय घोटाला सामने आया है, जिसने सरकारी तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) कार्यालय में तैनात चपरासी इरफान-उर-रहमान शम्सी पर ₹5 करोड़ से अधिक की धोखाधड़ी करने का आरोप है। जांच में सामने आया है कि आरोपी ने 53 बैंक खातों का जाल बिछाकर सरकारी वेतन फंड से फर्जी भुगतान निकालने की पूरी व्यवस्था खड़ी कर ली थी।

मामले के मुताबिक, आरोपी ने 98 संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के जरिए सरकारी धन को काल्पनिक लाभार्थियों के नाम पर ट्रांसफर किया। इन खातों के जरिए रकम को इधर-उधर घुमाया गया, जिससे ट्रांजैक्शन ट्रेल को जटिल बनाया जा सके। आरोप है कि इस पूरे नेटवर्क के जरिए करोड़ों रुपये की निकासी कर उन्हें निजी उपयोग में लाया गया।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इस घोटाले का एक अहम पहलू आरोपी का पारिवारिक नेटवर्क भी है। बताया जा रहा है कि शम्सी की तीन शादियां हैं और उसने अपने करीबी रिश्तों का इस्तेमाल इस वित्तीय जाल को मजबूत करने में किया। उसकी एक पत्नी के बैंक खाते में ही ₹1 करोड़ से अधिक की राशि ट्रांसफर की गई। इसके अलावा अन्य कई खातों में भी रकम भेजी गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह सुनियोजित और संगठित तरीके से किया गया फर्जीवाड़ा था।

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इतना ही नहीं, आरोपी ने अपनी एक पत्नी को फर्जी तरीके से शिक्षक के पद पर नियुक्त भी करवा दिया। इस नियुक्ति के जरिए नियमित वेतन निकाला जाता रहा, जो इस पूरे घोटाले का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। यह पहलू जांच एजेंसियों के लिए विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि इसमें नियुक्ति प्रक्रिया में भी हेरफेर की आशंका है।

यह पूरा मामला फरवरी महीने में सामने आया, जब बैंक ऑफ बड़ौदा की संबंधित शाखा के प्रबंधक ने DIOS कार्यालय से जुड़े खातों में हो रहे असामान्य और भारी लेन-देन की जानकारी जिला प्रशासन को दी। बैंक की इस सतर्कता के बाद प्रशासन हरकत में आया और प्रारंभिक जांच के बाद मामला दर्ज किया गया।

शिकायत के आधार पर कोतवाली पुलिस ने आरोपी और उसकी पत्नी के खिलाफ FIR दर्ज की। कानूनी प्रक्रिया के दौरान आरोपी ने अदालत से अग्रिम जमानत प्राप्त कर ली थी, लेकिन जमानत अवधि समाप्त होने के बाद उसने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की, जिसमें कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। फिलहाल आरोपी की एक पत्नी को भी गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि अन्य संदिग्धों की भूमिका की जांच जारी है।

जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी ने 2014 में DIOS कार्यालय में अपनी तैनाती हासिल की थी। इससे पहले वह बीसलपुर स्थित एक तकनीकी कॉलेज में चपरासी के पद पर कार्यरत था। आरोप है कि उसने फर्जी तरीके और प्रभाव का इस्तेमाल कर इस महत्वपूर्ण कार्यालय में अपनी पोस्टिंग करवाई, जहां उसे वित्तीय लेन-देन से जुड़ी प्रक्रियाओं तक पहुंच मिल गई।

पूछताछ के दौरान आरोपी ने दो अन्य कर्मचारियों—पियूष कुमार पाल और श्याम बाबू—के नाम भी लिए हैं और उन्हें इस घोटाले में शामिल बताया है। हालांकि दोनों कर्मचारियों ने इन आरोपों से इनकार किया है। पुलिस अब इन बयानों की सत्यता की जांच कर रही है और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर पूरे नेटवर्क को खंगालने में जुटी है।

प्रशासन ने इस मामले से जुड़े सभी 53 बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है, ताकि आगे किसी प्रकार की वित्तीय गतिविधि न हो सके। साथ ही ट्रांजैक्शन ट्रेल को खंगालकर यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि यह पैसा किन-किन लोगों तक पहुंचा और किस स्तर पर इसका उपयोग किया गया।

यह मामला सरकारी विभागों में वित्तीय निगरानी की कमजोरियों को उजागर करता है। एक निचले स्तर का कर्मचारी इतने बड़े पैमाने पर घोटाला करता रहा और लंबे समय तक पकड़ में नहीं आया, यह व्यवस्था की बड़ी चूक मानी जा रही है। हालांकि समय रहते बैंक द्वारा दी गई सूचना ने इस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश कर दिया।

फिलहाल जांच एजेंसियां इस मामले की गहराई से जांच कर रही हैं। आने वाले समय में और गिरफ्तारियां और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है। यह घटना एक चेतावनी के तौर पर भी देखी जा रही है कि सरकारी सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सख्त निगरानी और त्वरित कार्रवाई बेहद जरूरी है।

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