भोपाल। देश में तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों के बीच ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड का एक और गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की 64 वर्षीय महिला से करीब ₹25.65 लाख की ठगी कर ली गई। आरोपियों ने खुद को केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों का अधिकारी बताकर महिला को एक कथित राष्ट्रीय सुरक्षा जांच में फंसाने का डर दिखाया और उसे लगातार मानसिक दबाव में रखकर कई बैंक ट्रांजैक्शन करवा लिए।
जांच एजेंसियों के अनुसार, यह मामला नवंबर 2025 में दर्ज शिकायत से जुड़ा है, जब अरुणा चिंचोलकर नाम की महिला ने साइबर पुलिस को बताया कि उसे लगातार अज्ञात WhatsApp कॉल्स आ रहे थे। कॉल करने वालों ने खुद को Internal Security Department और Counter-Terrorism Department का अधिकारी बताया और दावा किया कि उसके नाम पर गंभीर आपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता पाई गई है।
इसके बाद आरोपियों ने “डिजिटल अरेस्ट” का डर पैदा करते हुए पीड़िता को यह विश्वास दिलाया कि वह वर्चुअल रूप से हिरासत में है और किसी भी समय उस पर कार्रवाई हो सकती है। इसी दबाव में उसे लगातार निगरानी में रखा गया और किसी भी बाहरी व्यक्ति से संपर्क करने से रोका गया, जिससे वह पूरी तरह अलग-थलग पड़ गई।
जांच में सामने आया कि ठगों ने इस दौरान फर्जी नोटिस, केस नंबर और डिजिटल कानूनी दस्तावेज भेजकर पूरे माहौल को वास्तविक जांच जैसा बना दिया था। पीड़िता को यह भरोसा दिलाया गया कि यदि वह “जांच में सहयोग” करेगी तो उसकी स्थिति स्पष्ट कर दी जाएगी और बाद में पूरी राशि वापस कर दी जाएगी। इसी बहाने उससे अलग-अलग बैंक खातों में कई किस्तों में पैसे ट्रांसफर कराए गए।
साइबर क्राइम टीम के अनुसार, रकम मिलते ही उसे तुरंत कई खातों में घुमाया गया और बाद में मनी लेयरिंग के जरिए ट्रेस करना मुश्किल बना दिया गया। जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि यह नेटवर्क कई राज्यों में सक्रिय हो सकता है और इसके पीछे संगठित साइबर गिरोह काम कर रहे हैं।
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इस मामले पर प्रख्यात साइबर क्राइम विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड आज के समय में सबसे खतरनाक साइबर अपराधों में से एक बन चुका है। उन्होंने कहा, “अपराधी अब तकनीक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक रणनीति का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे पहले भय पैदा करते हैं, फिर पीड़ित को सोचने और किसी से सलाह लेने का अवसर ही नहीं देते। यही कारण है कि पढ़े-लिखे और वरिष्ठ नागरिक भी इस जाल में फंस जाते हैं।”
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि यह पूरी ठगी एक सुनियोजित सोशल इंजीनियरिंग ऑपरेशन था, जिसमें तकनीक से ज्यादा मानसिक दबाव का उपयोग किया गया। आरोपियों ने लगातार कॉल, मैसेज और फर्जी दस्तावेजों के जरिए पीड़िता को भ्रमित और नियंत्रित रखा।
अधिकारियों के अनुसार, इस मामले में इस्तेमाल किए गए बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल ट्रांजैक्शन की गहन जांच जारी है। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस गिरोह ने अब तक कितने अन्य लोगों को इसी तरीके से निशाना बनाया है।
पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार नहीं करती और न ही इस तरह पैसे की मांग करती है। ऐसे किसी भी कॉल या संदेश पर तुरंत भरोसा न करें और इसकी सूचना राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर दें।
जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी हैं और उम्मीद है कि आने वाले दिनों में इस गिरोह के अन्य सदस्यों और पूरे नेटवर्क का भी खुलासा हो सकता है।
