“RHFL-RCFL मामले में शेल कंपनियों के जरिए कथित फंड डायवर्जन का खुलासा, 90% तक लोन संदिग्ध खातों में ट्रांसफर होने का दावा”

“कॉर्पोरेट लोन स्कैम पर ED का शिकंजा: ₹11,600 करोड़ फंड ट्रेल पर गंभीर सवाल”

Roopa
By Roopa
5 Min Read

मुंबई/नई दिल्ली। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) और रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड (RCFL) से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच में ₹11,600 करोड़ से अधिक को “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” यानी अपराध से अर्जित धन के रूप में चिह्नित किया है। यह मामला देश के कॉर्पोरेट लोनिंग सेक्टर में कथित बड़े पैमाने पर फंड डायवर्जन और वित्तीय अनियमितताओं की ओर इशारा करता है, जिसकी जांच अब निर्णायक चरण में पहुंचती दिख रही है।

दिल्ली की एक विशेष अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, ED ने RHFL से जुड़े ₹5,407.18 करोड़ और RCFL से जुड़े ₹6,280.47 करोड़ को संदिग्ध वित्तीय प्रवाह के रूप में दर्ज किया है। एजेंसी का आरोप है कि यह राशि बकाया ऋणों, आंशिक वसूली और कथित फंड डायवर्जन से जुड़ी है। जांच में यह भी सामने आया है कि लगभग 90% कॉर्पोरेट लोन शेल कंपनियों और संदिग्ध संस्थाओं के जरिए घुमाए गए।

जांच एजेंसी के अनुसार, कुल 98 लोन खातों के माध्यम से लगभग 45 कंपनियों को फंड जारी किया गया, जिनमें से कई कंपनियों का वास्तविक व्यवसायिक अस्तित्व बेहद कमजोर या नाममात्र का पाया गया। ED का दावा है कि कई मामलों में लोन स्वीकृति के दौरान सामान्य बैंकिंग मानकों की अनदेखी की गई, क्रेडिट मूल्यांकन प्रक्रियाओं को दरकिनार किया गया और आवश्यक ड्यू डिलिजेंस नहीं अपनाया गया।

RHFL से जुड़े मामले में एजेंसी ने बताया कि 2015 से 2020 के बीच कंपनी को ₹35,368.97 करोड़ की धनराशि प्राप्त हुई, जबकि 2018-19 के वित्तीय विवरणों में ₹12,728.89 करोड़ की देनदारियां दर्ज थीं। जांच में यह भी दावा किया गया है कि लगभग 80% लोन डिस्बर्समेंट का उपयोग आवासीय उद्देश्यों के बजाय अन्य गैर-निर्धारित कार्यों में किया गया, जिससे फंड उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

लोन डिफॉल्ट के बाद 2019 में रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के दिशानिर्देशों के तहत लेंडर्स ने इंटर-क्रेडिटर एग्रीमेंट किया था। 33 बैंकों के एक्सपोजर के बावजूद वसूली सीमित रही है। ED का कहना है कि पुनर्गठन प्रयासों के बावजूद कथित रूप से डायवर्ट किए गए फंड की बड़ी राशि अब तक रिकवर नहीं हो पाई है, जिसके चलते जांच और तेज कर दी गई है।

FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference

इसी तरह RCFL मामले में एजेंसी ने पाया कि FY16 से FY21 के बीच कंपनी ने लगभग ₹1.13 लाख करोड़ की धनराशि जुटाई, जबकि FY19 में इसका कुल कर्ज ₹10,518.5 करोड़ था। बैंक ऑफ बड़ौदा के नेतृत्व में डिफॉल्ट के बाद रेजोल्यूशन प्रक्रिया शुरू हुई और बाद में कंपनी का अधिग्रहण Authum Investment and Infrastructure Ltd द्वारा किया गया। हालांकि ED का आरोप है कि लगभग 83% फंड 36 शेल कंपनियों के माध्यम से 78 लोन खातों में ट्रांसफर किए गए।

जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ वरिष्ठ अधिकारी कथित रूप से फंड फ्लो, क्रेडिट अप्रूवल और लोन डिस्बर्समेंट प्रक्रियाओं पर महत्वपूर्ण नियंत्रण रखते थे। ED ने इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और बयानों के आधार पर आरोप लगाया है कि फंड को “पेपर कंपनियों” में घुमाने की रणनीति अपनाई गई, जिससे असली लाभार्थियों तक पहुंच को छिपाया जा सके।

अदालत ने आरोपियों की कस्टडी मंजूर करते हुए कहा कि मामला अभी प्रारंभिक चरण में है और प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका स्पष्ट रूप से निर्धारित की जानी बाकी है। अदालत ने यह भी कहा कि पूरे मनी ट्रेल की विस्तृत जांच आवश्यक है ताकि फंड डायवर्जन, लाभार्थियों और संभावित आर्थिक नुकसान की पूरी श्रृंखला सामने लाई जा सके।

ED ने अदालत में तर्क दिया कि आरोपी प्रभावशाली पदों पर रहे हैं और जांच को प्रभावित करने या गवाहों पर दबाव डालने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है।

वित्तीय अपराध विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में शेल कंपनियों, जटिल लेयरिंग ट्रांजैक्शन और मल्टी-लेयर फंड मूवमेंट के कारण जांच और वसूली दोनों बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती हैं। यह मामला एक बार फिर भारत के कॉर्पोरेट लेंडिंग सिस्टम में पारदर्शिता, निगरानी और गवर्नेंस की कमजोरियों को उजागर करता है।

फिलहाल RHFL और RCFL मामले की जांच जारी है और एजेंसियां पूरे फंड ट्रेल, लाभार्थियों और वित्तीय नुकसान की गहन जांच में जुटी हुई हैं।

हमसे जुड़ें

Share This Article