नई दिल्ली। द्वारका इलाके में साइबर अपराध का एक गंभीर और सुनियोजित मामला सामने आया है, जहां ठगों ने फर्जी ईमेल आईडी और जाली न्यायिक आदेशों के जरिए एक अंतरराष्ट्रीय निजी बैंक को निशाना बनाते हुए ₹8 लाख की ठगी कर ली। इस पूरी साजिश में आरोपियों ने खुद को पुलिस और न्यायिक अधिकारी बताकर बैंकिंग सिस्टम को भ्रमित किया और राशि को एक अन्य खाते में ट्रांसफर करा लिया।
यह मामला सितंबर से अक्टूबर 2025 के बीच का बताया जा रहा है। शिकायत के अनुसार, डीबीएस बैंक इंडिया लिमिटेड की महावीर नगर शाखा की ऑपरेशंस हेड दीपिका भग्गी ने इस संबंध में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। जांच में सामने आया है कि बैंक को लगातार कई संदिग्ध ईमेल प्राप्त हो रहे थे, जिनमें भेजने वालों ने खुद को केरल और दिल्ली साइबर क्राइम पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी के रूप में पेश किया था।
ईमेल आईडी को इस तरह डिजाइन किया गया था कि वे किसी आधिकारिक सरकारी डोमेन जैसी प्रतीत हों, जिससे बैंक अधिकारियों को शुरुआत में किसी प्रकार का संदेह नहीं हुआ। इसी भरोसे का फायदा उठाकर ठगों ने सबसे पहले बैंक को कुछ खातों पर ‘लियन मार्क’ लगाने के निर्देश दिए। इन निर्देशों का पालन करते हुए बैंक ने संबंधित खातों में लेन-देन अस्थायी रूप से रोक दिया।
जांच के अनुसार, यह साजिश यहीं नहीं रुकी। 22 सितंबर 2025 को आरोपियों ने एक और अधिक गंभीर फर्जी दस्तावेज भेजा, जिसे द्वारका कोर्ट के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के नाम पर तैयार किया गया था। इस कथित आदेश में बैंक को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि एक ग्राहक के खाते से ₹8 लाख की राशि एक निर्धारित खाते में ट्रांसफर की जाए।
फर्जी न्यायिक आदेश को असली मानते हुए बैंक ने प्रक्रिया आगे बढ़ाई और 24 अक्टूबर 2025 को ₹8 लाख की राशि एक आईडीएफसी बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी। रकम ट्रांसफर होने के बाद बैंक ने औपचारिक सत्यापन प्रक्रिया के तहत संबंधित न्यायिक अधिकारियों से संपर्क किया, जिसके बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ।
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जांच में यह स्पष्ट हो गया कि न तो कोई वास्तविक कोर्ट ऑर्डर जारी किया गया था और न ही भेजे गए ईमेल किसी सरकारी या अधिकृत एजेंसी के आधिकारिक डोमेन से थे। पूरा मामला पूरी तरह फर्जी पहचान, तकनीकी हेरफेर और साइबर धोखाधड़ी पर आधारित था, जिसमें पुलिस अधिकारियों और न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता का दुरुपयोग किया गया।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह एक योजनाबद्ध साइबर फ्रॉड है, जिसमें अपराधियों ने प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र की छवि का इस्तेमाल कर बैंक को भ्रमित किया। शुरुआती जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि इस तरह की तकनीक का उपयोग अन्य मामलों में भी किया जा सकता है, जिससे बड़े वित्तीय संस्थान जोखिम में आ सकते हैं।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि अपराधी अत्यंत पेशेवर तरीके से नकली ईमेल डोमेन, फर्जी हस्ताक्षर और अदालत जैसे दस्तावेज तैयार करते हैं। कई बार बैंक कर्मचारी प्रक्रिया के दबाव में बिना गहन सत्यापन के ऐसे आदेशों को स्वीकार कर लेते हैं, जिससे यह तरह की धोखाधड़ी संभव हो जाती है।
फिलहाल पुलिस उस बैंक खाते की ट्रांजैक्शन डिटेल्स की जांच कर रही है जिसमें ₹8 लाख ट्रांसफर किए गए थे। साथ ही ईमेल सर्वर, आईपी एड्रेस और डिजिटल फुटप्रिंट की तकनीकी जांच भी जारी है ताकि आरोपियों तक पहुंचा जा सके।
इस घटना ने एक बार फिर बैंकिंग सेक्टर की साइबर सुरक्षा व्यवस्था और वेरिफिकेशन सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायिक या पुलिस आदेशों की पुष्टि के लिए मल्टी-लेवल वेरिफिकेशन सिस्टम को अनिवार्य किया जाना चाहिए ताकि ऐसे साइबर फ्रॉड को रोका जा सके।
फिलहाल पुलिस मामले की गहन जांच में जुटी हुई है और आरोपियों की पहचान के प्रयास तेज कर दिए गए हैं।
