पटना। सोशल मीडिया पर निवेश के नाम पर फैल रहे साइबर फ्रॉड ने एक बार फिर गंभीर चिंता खड़ी कर दी है। पटना में एक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी करीब ₹97 लाख की ठगी का शिकार हो गए। उन्हें फेसबुक पर दिखे एक आकर्षक ट्रेडिंग विज्ञापन के जरिए फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया। शुरुआती छोटे मुनाफे दिखाकर भरोसा जीता गया और धीरे-धीरे पूरी जीवन भर की जमा पूंजी हड़प ली गई। यह मामला संगठित साइबर अपराध नेटवर्क की बढ़ती सक्रियता की ओर इशारा करता है।
पीड़ित अधिकारी वर्ष 2024 में बैंक के वरिष्ठ प्रबंधन पद से सेवानिवृत्त हुए थे। रिटायरमेंट के बाद वे सुरक्षित निवेश के विकल्प तलाश रहे थे। इसी दौरान फेसबुक पर उन्हें एक ट्रेडिंग विज्ञापन दिखाई दिया, जिसमें कम समय में अधिक लाभ का दावा किया गया था। विज्ञापन पर क्लिक करते ही उनका संपर्क ठगों से शुरू हो गया, जिन्होंने एक पेशेवर वातावरण बनाकर बातचीत आगे बढ़ाई।
शुरुआत में ठगों ने खुद को एक बड़ी निर्माण कंपनी से जुड़ा बताया और एक महिला ने स्वयं को कंपनी की CEO के रूप में पेश किया। व्हाट्सऐप पर लगातार बातचीत के जरिए भरोसा मजबूत किया गया और शुरुआती निवेश पर छोटे-छोटे लाभ दिखाकर विश्वास पैदा किया गया।
FCRF Returns With CDPO, Its Premier Data Protection Certification for Privacy Professionals
इसके बाद पीड़ित को एक फर्जी ट्रेडिंग ऐप डाउनलोड कराया गया, जहां लगातार बढ़ते हुए रिटर्न दिखाए जाते रहे। मात्र ₹43 हजार के शुरुआती निवेश पर लाभ दिखाकर उन्हें और अधिक निवेश के लिए प्रेरित किया गया। धीरे-धीरे उन्होंने बड़ी रकम निवेश करनी शुरू कर दी।
जैसे ही पीड़ित ने अपनी राशि निकालने की कोशिश की, ठगों ने नए-नए बहाने शुरू कर दिए। कभी टैक्स, कभी कमीशन और कभी सिक्योरिटी डिपॉजिट के नाम पर लगातार रकम मांगी गई। कई चरणों में उनसे कुल ₹97 लाख वसूले गए। हर बार भरोसा दिलाया गया कि अंतिम भुगतान के बाद पूरी राशि वापस कर दी जाएगी।
स्थिति तब स्पष्ट हुई जब पीड़ित ने अतिरिक्त भुगतान से इनकार कर अपनी राशि वापस मांगी। इसके बाद ठगों ने अचानक सभी संपर्क माध्यम बंद कर दिए और गायब हो गए। इसके बाद पीड़ित को एहसास हुआ कि वह एक सुनियोजित साइबर जाल में फंस चुके हैं।
मामले की शिकायत के बाद जांच शुरू कर दी गई है। प्रारंभिक निष्कर्षों में संकेत मिले हैं कि यह किसी अंतरराज्यीय साइबर गिरोह का हिस्सा हो सकता है, जो फर्जी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म और सोशल इंजीनियरिंग तकनीकों के जरिए लोगों को निशाना बनाता है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा कि “ऐसे मामलों में ठग पहले सोशल इंजीनियरिंग के जरिए भरोसा बनाते हैं और फिर फर्जी ऐप व निवेश प्लेटफॉर्म के माध्यम से पीड़ित की जीवन भर की बचत को धीरे-धीरे निकाल लेते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिखने वाले असामान्य लाभ के वादों पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि सोशल मीडिया पर दिखने वाले किसी भी निवेश ऑफर पर तुरंत भरोसा न किया जाए और हर प्लेटफॉर्म की वैधता की स्वतंत्र रूप से जांच की जाए।
पुलिस और साइबर टीम अब डिजिटल ट्रेल, बैंक खातों और लेनदेन नेटवर्क की गहन जांच कर रही है। शुरुआती जांच में पता चला है कि ठगी की रकम को कई लेयर वाले खातों और डिजिटल वॉलेट के जरिए आगे ट्रांसफर किया गया, ताकि स्रोत को छिपाया जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि रिटायर हो चुके वरिष्ठ नागरिक ऐसे साइबर फ्रॉड के प्रमुख निशाने पर हैं। इसलिए किसी भी अनजान लिंक, ऐप या निवेश प्लेटफॉर्म पर बिना सत्यापन के कदम उठाना बेहद जोखिम भरा हो सकता है।
बैंकिंग और साइबर सुरक्षा एजेंसियों ने दोहराया है कि कोई भी वैध वित्तीय संस्था बार-बार अलग-अलग शुल्क या गुप्त भुगतान की मांग नहीं करती।
नागरिकों को सलाह दी गई है कि किसी भी निवेश अवसर को भावनात्मक दबाव में आकर स्वीकार न करें और पहले स्वतंत्र सत्यापन अवश्य करें
